आनंद
आप जब आत्मा से निर्विकार रूप में प्रसन्न होते है, वह ख़ुशी जिससे आप प्रसन्न हुए यही आनंद है. आह्लादित व्यक्ति उस आह्लाद के सिवा कुछ नही जनता. परन्तु आह्लाद बाधित होने पर ईश्वर को याद करता है ठीक उसी प्रकार जैसे एक बच्चा, जब वह भली-भाँती खेल,कूद या पढ़ रहा हो तो परेशानी आने पर माँ-बाप का नाम लेता है.
उसके इन परेशानीयों को वह दूर कर देते है इसीलिये.परन्तु वे आनंद प्रदान करने में अल्पसक्षम है लेकिन ईश्वर नही. वह पूर्ण सक्षम है.जो आह्लाद प्रफुल्लित कर रहा था वास्तव में वह चिरानंद के आनंद का संकेत था और हंसी ठाहाके उसके वाद्य.
आत्म प्रसन्नता ही ईश्वर का स्नेह है. आनंद ही ईश्वर है. किन्तु उसमे विघ्न उत्पन्न होने पर हम ईश्वर को पुकार उठते हैं जो चिंता के किरणों को दीप्त का रहा है जिससे तुम दुखी हो वह यही चिंता है.चिंता नही अपितु चिंतन करो. चिंतित विचारों के झाल को भेद कर पुनः ईश्वर रूपी आनंद की प्राप्ति करो.
ईश्वर आत्मरूप होकर हमारे अन्दर समाहित है जिसके प्रकाश से शरीर दीप्तमान हो रही है. आत्मा को प्रसन्न रखो, ईश्वर प्रसन्न हो गया.निःसंदेह "आत्मानंद ईश्वर की प्रसन्नता है शांति का द्योतक है.
आप जब आत्मा से निर्विकार रूप में प्रसन्न होते है, वह ख़ुशी जिससे आप प्रसन्न हुए यही आनंद है. आह्लादित व्यक्ति उस आह्लाद के सिवा कुछ नही जनता. परन्तु आह्लाद बाधित होने पर ईश्वर को याद करता है ठीक उसी प्रकार जैसे एक बच्चा, जब वह भली-भाँती खेल,कूद या पढ़ रहा हो तो परेशानी आने पर माँ-बाप का नाम लेता है.
उसके इन परेशानीयों को वह दूर कर देते है इसीलिये.परन्तु वे आनंद प्रदान करने में अल्पसक्षम है लेकिन ईश्वर नही. वह पूर्ण सक्षम है.जो आह्लाद प्रफुल्लित कर रहा था वास्तव में वह चिरानंद के आनंद का संकेत था और हंसी ठाहाके उसके वाद्य.
आत्म प्रसन्नता ही ईश्वर का स्नेह है. आनंद ही ईश्वर है. किन्तु उसमे विघ्न उत्पन्न होने पर हम ईश्वर को पुकार उठते हैं जो चिंता के किरणों को दीप्त का रहा है जिससे तुम दुखी हो वह यही चिंता है.चिंता नही अपितु चिंतन करो. चिंतित विचारों के झाल को भेद कर पुनः ईश्वर रूपी आनंद की प्राप्ति करो.
ईश्वर आत्मरूप होकर हमारे अन्दर समाहित है जिसके प्रकाश से शरीर दीप्तमान हो रही है. आत्मा को प्रसन्न रखो, ईश्वर प्रसन्न हो गया.निःसंदेह "आत्मानंद ईश्वर की प्रसन्नता है शांति का द्योतक है.


