खुद से बात




ये नगमे तुम जो गुनगुनाते हो दिन रात
ये कसमें तुम जो खाते हो सुबह शाम,
हर पल हर घड़ी खुद से करते हो बात
खाते हो गोते भूल जाते हो नाम.
आँखें खुली रहती हैं और सोते हो दिन रात
काम करते-2 ख़्वाब ‘और’ बनाते हो बात.
किताबों में चेहरे से बात करते,
अक्षरों को प्रश्न मान कर हल करते.
कभी फेल कभी पास हो जाते हो
इक पल हँस कर हर पल रोते रहते हो
क्यूँ कमज़ोर हो जाते हो ? खुद से थक जाते ?
क्यूँ नहीं हँसते हो सपनों के नहीं हैं किसी से
नाते.
रंग दे  हक़ीकत से ज़िन्दगी
ख़्वाब भी करेगें तुझसे बंदगी. 

-श्री निवास द्विवेदी यू