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प्रदेश में कोल्ड स्टोरेज की कमी से किसान परेशान
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तहत संचालित व हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. स्वरूप कुमार चक्रवर्ती ने बताया कि
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2022 में करीब 140 लाख टन आलू का उत्पादन हुआ है। जो की देश का सबसे ज्यादा आलू उत्पादन करने वाला राज्य है। लेकिन आलू के निर्यात में गुजरात अव्वल है। जो 25 फीसदी आलू का निर्यात करता है। आलू निर्यात में पिछड़ने की वजह है फसल का सही रख रखाव न हो पाना।
एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में कुल उतापदन का लगभग 15 से 20 फ़ीसदी फसल का उचित भंडारण नहीं हो पता हैं। किसान फसलों को लेकर कई कई दिनों तक लाइन लगाता है फिर भी उसे कोल्डस्टोर में उसकी फसल रखने की जगह नहीं मिल पाती है। टैक्टर ट्रॉली लेकर आए किसान फसल ना स्टोर किए जाने पर वहीं पलट कर चलें जातें हैं।
प्रदेश में लगभग 2700 निजी और सरकारी शीत भंडारण गृह हैं। जिनकी अनुमानित भंडारण क्षमता लगभग 120 से 125 लाख मीट्रिक टन है।इस तरह से प्रदेश में 140 लाख मीट्रिक टन के उत्पादन के अनुसार लगभग इस बार भी 14 से 15 लाख मीट्रिक टन का उचित लाभ किसानो को नहीं मिल पायेगा।
देश में आलू के निर्यात की काफी संभावना है। चीन के बाद भारत दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक देश है । निर्यात बढ़ने से प्रदेश के किसानों को उनकी फसल का अच्छा भाव मिलेगा। लेकिन उसके लिए आवश्यक है फसल का उचित भंडारण तथा बिक्री।
कोल्ड स्टोरेज या शीत भंडारण गृह की आवश्यकता क्यों
आपको बता दें कि शीत भण्डारण गृह का उपयोग आपके घर की फ्रिज की तरह ही होता हैं। जहां बड़े पैमाने पर सब्जी और फलों का स्टोर किया जाता हैं
जिसेसे उनका बिना गुणवत्ता कम किए इस्तेमाल तब भी क्या जा सके जब वो खेत में उपलब्ध ना हों।
प्रमुख रूप से सब्जी में आलू, कद्दू, प्याज और लहसुन का स्टोरेज किया जाता है। फल में सेब, संतरा, आम, अनार, अन्नास, केला जैसे प्रमुख फसल है।
कोल्ड स्टोरेज की अनुपलब्धता से नुकसान
देश में आलू उत्पादन प्रति वर्ष बढ़ रहा है किंतु उस अनुपात में आलू के स्टोर की मात्रा घट रही है। जिसके कई दुष्परिणाम है जैसे
1 पर्याप्त शीत भण्डारण गृह ना उपलब्ध होने के कारण फसलें बर्बाद होती है। अधिकतर किसानों के फसल का सही भंडारण ना होने की वजह से सड़ जाती हैं और कुछ किसान परेशान होकर औने पौने दामों में व्यापारियों को बेच देते हैं।
2 फसल का उचित विक्रय नहीं होने से किसानों की आय में कमी।
3 निर्यात में कमी। जिसके वजह से विदेशी मुद्रा कोष में घाटा।
कोल्ड स्टोरेज चलाने की समस्या
कोल्ड स्टोरेज चलाने के लिए बड़े पैमाने पर बिजली लगती और अमोनिया गैस सिलेंडर लगता है।अब कहीं बिजली की समस्या है तो कहीं अमोनिया की। कुछ ऐसे स्टोरेज हैं जो बैंक लोन नहीं चुका पाए। इस लिए कई कोल्ड स्टोर तो बंद पड़ें हैं।
अगर बात की जाए कोल्ड स्टोरे के निर्माण की तो भारत सरकार ने इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया है और कोल्ड स्टोरे निर्माण के लिए अनुदान एवम् लोन उपलब्ध करा रही है। किंतु व्यापारियों का कहना है सरकार बिजली और अमोनिया उचित मात्रा में उपलब्ध कराए तब जाकर कही यह समस्या हल हो सकती है।
कोल्ड स्टोर निर्माण के लिए निजी और सरकारी क्षेत्र को मिल कर काम करना होगा। इस क्षेत्र की चुनौतियों का साझा समाधान ढूंढना होगा।
कोल्ड स्टोर संख्या और क्षमता
कोल्ड स्टोर की संख्या भंडारण क्षमता से अधिक होनी चाहिए। ताकि फसलों को अच्छे से रख जा सके। फसलें सड़े ना बर्बाद होने से बचें। जिससे उत्पादन स्तर और विक्रय स्तर भी सतत और समानुपाती रहे। यदि उत्पाद का समुचित रख रखाव कर उनका विक्रय हो तो किसानों के साथ साथ सरकार को भी मुनाफा होगा। देश की जीडीपी भी बढ़ेगी। यह अपार संभावनाओं का क्षेत्र है।
कैरियर
self value
एक गांव ऐसा भी
जयनगर गांव के लोग अब सरकार को ना कोई लगान देते अपने जोत वाली जमीन का और ना ही किसी प्रकार की सुविधा की अपेक्षा रखते हैं बल्कि वह स्वयं अपने पर निर्भर हैं। सारे लोग गांव की सड़क, बिजली व पानी के साथ साथ, साफ सफाई का पूरा इंतजाम खुद से कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार जो जनता का पैसा विभिन्न रूपों में ले लेती है जैसे सभी प्रकार के कर। और उसे पब्लिक को वापस कर देती है। सड़कें, नाली, बिजली, पानी व साफ सफाई के सुविधाओं के द्वारा और खाद तेल पर सब्सिडी यह पैसे जनता को मिल जाते हैं। जो कि हम लोगों को नहीं चाहिए। अपने गांव घर की सारी सुविधा साज-सज्जा एवं प्रबंधन हम स्वयं कर लेंगे। बस सरकार यह जितने बैट हैं और सुविधा शुल्क हैं हटा ले।
हम लोग अपनी सारी भौतिक सुख एवं सुविधाओं का खर्च खुद से वहन करना चाहते हैं।अतः हम आज से धरने पर बैठ रहे हैं। और सरकार से दरखास्त करते हैं कि वह हमारी बात को माने और हमें सभी कर से छूट दे। क्योंकि अभी तक सरकार ने ना हमारे गांव तक लाइट पहुंचाई है। और ना ही सड़कें। यह जो सब आप देख रहे हैं वह गांव श्रमिकों के पसीने का फल है। इसीलिए सरकार हमारे सारे कर माफ करें हम लोग सारे सुख सुविधा खुद से उपलब्ध करा रहे हैं। हमारे यहां कोई सरकारी योजना अभी तक रोशनी नहीं ला पाई थी। जिसको हमारे गांव में लोगों ने अथक परिश्रम आर्थिक योगदान देकर उपलब्ध कराया है।
वर्तमान समय स्पीड का है अतः हमने जो भी यह भौतिकता गांव को प्रदान की है वह सब हमारे अथक प्रयासों का नतीजा है। हमने इस में धन और तन के साथ-साथ मन का भी पूरा इस्तेमाल किया है। और जिस गांव में खड़ंजा नहीं थे उसी गांव में सीसी सड़कें बना ली गई हैं। तथा उसके साफ सफाई के लिए कार्यकर्ता भी नियुक्त कर लिए हैं हमने। तथा उनके पारिश्रमिक का भी पूरा पूरा ख्याल रखा गया है। अब गांव के किसी कोने व रास्ते पर नाली का पानी नहीं मिलेगा। कोई मलेरिया हैजा का मरीज नहीं मिलेगा। सब स्वस्थ हैं। इतना ही नहीं पूरे गांव में नशा करने वाले भी आपको नहीं मिलेंगे। इन सब के साथ साथ जगह-जगह आपको कूड़ा दान भी मिलेंगे। जहां आपको कूड़ा डालना है।
कृषकों को साग सब्जी उगाने तथा उनके बेचने के लिए बाजार की व्यवस्था है। तथा गांव वाले इन्हीं दुकानों से ही सामान खरीदते हैं वह दूसरे गांव को भी बुलाते हैं कि आप हमारे यहां लगने वाले बाजार से ही सामान ले औरअपना समान बेचें भी। और वह गुणवत्ता परक खाद्य सामग्री भी उपलब्ध कराते हैं। वह सारे आत्मनिर्भर बनकर जीवन जीना चाहते हैं। वो नहीं चाहते कि सरकार पागल बना कर राजनीतिक रोटी सेकती रहे। और वो अपने बाल बच्चों को जीवन की मूलभूत सुख सुविधाओं से वंचित रख कर इस आशा में बैठे रहे कि सरकार तो सब्सिडी देगी। कोई योजना बनाएगी और हम मुफ्त की योजना के लिए आशा करते करते बूढ़े हो जाएं। ना हमें मिले और ना ही हम सक्षम रहें अपने आने वाली पीढ़ी को देने के लिए। हम ऐसा बिल्कुल नहीं चाहते।
हम अपने बल पर पैरों पर खड़े होकर फौलादी हाथों से अपने भविष्य के उन्नत मस्तक को सफलता का हार एवं खुशी का सेहरा पर पहनाना चाहते हैं।