भ्रष्टाचार-लेख

नमस्कार !
आपका अपना होस्ट और दोस्त श्री निवास द्विवेदी लेके हाज़िर है आपका अपना प्रोग्राम 'विचारशाला'।

आज विचारशाला में मैं एक गंभीर मुद्दे पर चर्चा करना चाहता हूँ. आशा है आपको भी मज़ा आयेगा. visuals देखें जी हाँ सही पहचाना अपने "भ्रष्टाचार" एक ऐसा मुद्दा जिससे सिस्टम को दीमक लग गये है और सभी कार्यालयी  कार्यप्रणाली काले घेरे में आ गयी है.तो आइये जानते है की ओ कौन से तत्व है जो भष्टाचार नामक इस 'विषवेल' को  समाज में अपना पाँव पसारने दे रहे है.
 आखिर ...

-किस कारण  सामाजिक व नैतिक मूल्यों का पतन एवम् संवैधानिक मूल्यों का उलंघन कर रहे इस बिषवेल की जड़ मोटी हुई ?

-आखिर कौन सींचता है इसे ?

- ये कैसे साँस ले रही है गांधी के घर में ?

- क्या इस विषवेल की जड़ उखाड़ा जा सकता है ? 

जैसा की हम सभी जानते है सब कुछ संभव है.जी हाँ सब कुछ अगर हम चाहते हैं की भारत भविष्य में भ्रष्टाचार मुक्त हो... तो हमको अपने कार्यशैली-व्यावहारिक तरीकों में आमूल-चूल बदलाव करना होगा. क्योकि ये देश है तुम्हारा और नेता तुम्ही हो कल के. भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए सब को [बच्चा बूढा नौजवान,आगे आयें सीना तान] संगठित होना होगा.जिससे हम उससे आखिरी लड़ाई लड़ सकें.

इसके लिए हमें अपने त्वारितस्वार्थ का परित्याग करना होगा. हम सभी अपने स्वार्थ का त्याग करके भ्रष्टाचार से मुक्त हो सकत है. सभी जानते है कि-परित्याग सामाजिक बुराइयों पर विजय की कुंजी है. संगठन हमें त्याग और बलिदान सिखाता है.जब हम अपने देश के लिए काम करते हैं तो वह भी एक बलिदान है. जिस देश में हम सभी रहते है, हमें हर संभव कार्य उस देश के लिए करना चाहिए.क्योकि ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्ही हो कल के.

उठो! अपने जयघोष को बदलो. हम कार्य देश के लिए करेंगे,अपने लिए नही.अगर देश पूर्ण रूप से विकसित होगा तो हमारा विकास निरंतर सुदृढ़ होगा.
बिडम्बना कि म्हारे[राजस्थानी] समाज में आजादी के 70 वर्षा नु बाद भी विषाक्त तत्व मौजूद है जो भ्रष्टाचार  की जड़ें सींच रहे है.  ये लोग है जो- शारीरिक परिश्रम नही करना चाहते, समयाभाव का दिखावा करते है,सामाजिक और संवैधानिक तौर-तरीकों को अपने झूठी शान के खिलाफ़ समझते है और अपने हर कार्य पर आर्थिक व अन्य न्याय असंगत समजौते की पेशकश करते है.

ऐसे लोग जो इन न्याय असंगत समझौता ऑफर मिलने पर अपने कार्य-वसूलों व पद्गोपनियता-शपथ को भूल करने की गलती करतें है उनकी वजह से ये विषवेल सांस ले रही है.इसका केवल और केवल एक मात्र कारण हमारी खुली आँखों की आंधता है.अगर हम अपने हर कार्य का स्वमूल्यांकन करें और अपने कर्तव्यों के प्रति जवाबदेहि तय करें तो इस विषवेल से मुक्ति मिल सकती है.हमारे पास जूनून है, जज्बा है उठो जागो लड़ो जिससे हम अपने समाज को भ्रष्टाचार मुक्त कर सकें.
हमारे पास मानवता की महानशक्ती है .

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