टूटे अरमानों के नयन नीर

वाडेकर जी की जादुई आवाज को समर्पित यह गीत |
     
टूटे अरमानों के नयन-नीर हैं ह्रदय के नाजुक पीर
दिखते हैं जो तार-तार,बिखरे हैं आर-पार
ढकने को नही चीर, टूटे अरमानो के../1/

यूँ ही बैठी गगन के निचे मगन
देखो तो कैसे खिला है गगन
सुन्दर सुमन-तारे, प्यार से खिल-खिलते सारे
चांदनी चमचमाती चूनर पहन धरती निहारे
धीर धरती सजी-सवंरी बैठी दर्श सहारे
मृग-नैनों में बसे हैं प्रीतम प्यारे
टूटे न पुल धरती के सब्र का
तनहाइयां ले न लें रूप कब्र का
दहकती है सीने में अगन..यूँ ही बैठी गान के../2/

हिम हिमालय का पिघलने लगा,
पानी बनकर बहने लगा
ठोकरें खाते बलखाते जीवन पुष्प उगाते
निर्मल धवल उज्जवल प्रेम राग गाते
बिनु कपट चलती झपटि
मधुर मुस्काती डपट-लपटि
मुस्काती देख धरती चांदनी गगन..यूँ ही बैठी../3/

घन-घोर घहराने लगे, जल-मुक्ता बरसाने लगे
बिजलियाँ दिखाती राह,
किसी के मुख से आएना आह
कोना-कोना भिगा रहें हैं,
दरख्तों के पत्ते झूमे जा रहें हैं
खुश धरती सौगात से निहारती गगन..यूँ ही बैठा../4/
बागों में भौरो ने छेड़े है राग मधुर
चमन में आज गीतों की मुस्कान मधुर
प्यारी सलोनी कली क्या खूब खिली
झूमती चली सखियों से मिली
शेर- आसमा के तारे बिखर गए हों धरा पर
ऐसे दिखते सुमन,
इहर-उधर चारो तरफ बिखर गए हों इत्र जैसे महेके गुलशन

धरती को ये देख हुई चुभन..यूँ ही बैठा../5.
               श्री निवास द्विवेदी यू

नगम-ए-जिंदगी-'चलना ही जिन्दगी है'

ये गीत मैंने "अमिताभ बच्चन"  जी के लिए  लिखा है | मेरी अभिलाषा है की  गीत 'नगम-ए-जिंदगी' को उनकी आवाज-ए-नवाजिस हो |

चलना ही जिन्दगी है वो रही चलते रहना
खुद को देख अकेला पीछे न मुड़ना
वो राही चलते रहना ...खुद को देख अकेला /1/

तू जब जग में आया तो था अकेला
जो जग से जायेगा तो होगा अकेला
अपने कर्मों को चखेगा तू और भरेगा तू
जिस डाल पर जायेगा, उसका फल खायेगा
जो आशियाँ बनायेगा, ख़्वाब उसी में आयेगा
ख्वाबों को रहते होगा बुनना....वो राही पीछे../2/

कर्म जीवन का मूल मंत्र है,
यह जग का आधार तंत्र है.
श्रम नाव पकड़ कर चलते रहना
मंजिल मिलेगी बस सब्र रखना
इक दिन कर्म की धारा जा थमेगी कर्म निधि में
फिर होगा तू भाग्य विधाता अपने विधि में
सूरज के किरणों संग होगा चलना../3/

तू थक सकता है तेरी धड़कन चलती रहती है अवसरों को पतवार बना ले,
कर्मो का अम्बार लगा दे .
धड़कन थमने से पहले रोप दे कर्म-पौध को
जिसका पुष्प सुगंध महेका दे जग को
तेरी अस्थि-चर्म-लहू होंगे आबोदाना,
झांकेगा जिससे नया जमाना जिससे नया जमाना../4/

वो रास्ते, लिखी है तुम ने जिसपे दस्ताने,
लोगों का होगा वो अफ़शाना.
उन रंग बिरंगे ख्वाबों के,
पोषक बना पहनेगा जमाना.  
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर पुकारेगा जमाना
वो खवाबों को हकीकत बनानेवाला
कहाँ गया तू तुझ बिन सूना है आशियाना
कहाँ गया तू हकीकत के रंग ज़माने वाला
तुझ बिन सूना है आशियाना ../5/ वो रही...
           -श्री निवास द्विवेदी यू

घर में बैठा देख रहा था(गीत)

गीत

                        घर में बैठा देख रहा था

घर में बैठा देख रहा था,
बागों में फूल महक रहा था 
सपनो का सावन ले अंगड़ाई
झूमे मस्त पवन में अमराई
सीने में मधुर उठ रही थी लहर
बसी थी आँखों में वर्षों पुरानी कहर
शेर-मेरी अपनी मोहब्बत ने मुझे जला दिया था
प्यार की जगह मैंने शराब की बोतल घुट-घुट के पिया था..घर में बैठा देख रहा था ..../1/

किश्मत ने मुझको खूब रुलाया की-
नींद ने फिर कभी न सुलाया
ईद के चाँद हुए अब ख्वाब
रौशनी गुल हुई रहा न माहताब
किसके सहारे अब काटूं ये अंधियारी ज़िन्दगी
तारों के सिवा अंधेरों को भला कौन करेगा बंदगी
वहाँ दुल्हन का सजना सवरना बेकार था
जहाँ अंधेरों का बारात था..घर में बैठा..../2/

शेर-इन मासूम अदावों ने हमें क्या-2 नही सिखाया,
इनकी मदमस्त इशारों पर हमने जवानी लुटाये,.
मेरे दिल में ऐसी कोई गली थी नही
जिस पर ओ चली थी नही
गिनता रहता था पाँव के धुन
हर दिन उसके सपने बुन-बुन
सुबह शाम करता था दुआ
मंजूर शायद उसको न हुआ
हर रात काट रहा था, किसी तरह जालिम दिन बिता रहा था..घर में बैठा..../3/

रास्तों के कांटे तो मंजिल से हैं दूरियां बनाते
मुशाफिर के अदम्य हौषलों को देख हैं झुक जाते
(गर चल दो तो) 
पैरों के चाल से धरती पर निशान बन जाते हैं
अरमानो के फूल बन कर वो खिल जाते हैं
जिन्दगी की उठा-पटक, चढाती है रंग चटक
सुर से सुर मिला के मटक,
कठिनाई तो है इक लटक
शेर- राह में मुश्किलें हो चाहे जितनी मगर
मंजिल को पाना नामुमकिन नही होता,
बादलों के छाने, घटाओं के घिर जाने से
भले रौशनी कम हो लेकिन, सूरज नही मिटता,.
आखीर क्यों उस ख़्वाब के इन्तजार में खोया हूँ
जिसे पता है की मैं अभी नही सोया हूँ
जाम मेरा दोस्त..देता है तसल्ली
कल थे दोस्त वो उड़ाते हैं खिल्ली
आखिर क्यों गाता था वो गीत जो तुम्हे भाता था, क्या थी मेरी भूल..क्या थी मेरी खता    
जो तू नही सिर्फ मैं तुम्हे चाहता था. शायद मैं बेसुरा गाता था..घर में बैठा..../4/
              श्री निवास द्विवेदी यू