वाडेकर जी की जादुई आवाज को समर्पित यह गीत |
श्री निवास
द्विवेदी “यूथ नजर”
टूटे अरमानों के नयन-नीर हैं ह्रदय के नाजुक पीर
दिखते हैं जो तार-तार,बिखरे हैं आर-पार
ढकने को नही चीर, टूटे अरमानो के../1/
यूँ ही बैठी गगन के निचे मगन
देखो तो कैसे खिला है गगन
सुन्दर सुमन-तारे, प्यार से खिल-खिलते सारे
चांदनी चमचमाती चूनर पहन धरती निहारे
धीर धरती सजी-सवंरी बैठी दर्श सहारे
मृग-नैनों में बसे हैं प्रीतम प्यारे
टूटे न पुल धरती के सब्र का
तनहाइयां ले न लें रूप कब्र का
दहकती है सीने में अगन..यूँ ही बैठी गान के../2/
हिम हिमालय का पिघलने लगा,
पानी बनकर बहने लगा
ठोकरें खाते बलखाते जीवन पुष्प उगाते
निर्मल धवल उज्जवल प्रेम राग गाते
बिनु कपट चलती झपटि
मधुर मुस्काती डपट-लपटि
मुस्काती देख धरती चांदनी गगन..यूँ ही बैठी../3/
घन-घोर घहराने लगे, जल-मुक्ता बरसाने लगे
बिजलियाँ दिखाती राह,
किसी के मुख से आएना आह
कोना-कोना भिगा रहें हैं,
दरख्तों के पत्ते झूमे जा रहें हैं
खुश धरती सौगात से निहारती गगन..यूँ ही बैठा../4/
बागों में भौरो ने छेड़े है राग मधुर
चमन में आज गीतों की मुस्कान मधुर
प्यारी सलोनी कली क्या खूब खिली
झूमती चली सखियों से मिली
शेर- आसमा के तारे बिखर गए हों धरा पर
ऐसे दिखते सुमन,
इहर-उधर चारो तरफ बिखर गए हों इत्र जैसे महेके गुलशन
धरती को ये देख हुई चुभन..यूँ ही बैठा../5.