नगम-ए-जिंदगी-'चलना ही जिन्दगी है'

ये गीत मैंने "अमिताभ बच्चन"  जी के लिए  लिखा है | मेरी अभिलाषा है की  गीत 'नगम-ए-जिंदगी' को उनकी आवाज-ए-नवाजिस हो |

चलना ही जिन्दगी है वो रही चलते रहना
खुद को देख अकेला पीछे न मुड़ना
वो राही चलते रहना ...खुद को देख अकेला /1/

तू जब जग में आया तो था अकेला
जो जग से जायेगा तो होगा अकेला
अपने कर्मों को चखेगा तू और भरेगा तू
जिस डाल पर जायेगा, उसका फल खायेगा
जो आशियाँ बनायेगा, ख़्वाब उसी में आयेगा
ख्वाबों को रहते होगा बुनना....वो राही पीछे../2/

कर्म जीवन का मूल मंत्र है,
यह जग का आधार तंत्र है.
श्रम नाव पकड़ कर चलते रहना
मंजिल मिलेगी बस सब्र रखना
इक दिन कर्म की धारा जा थमेगी कर्म निधि में
फिर होगा तू भाग्य विधाता अपने विधि में
सूरज के किरणों संग होगा चलना../3/

तू थक सकता है तेरी धड़कन चलती रहती है अवसरों को पतवार बना ले,
कर्मो का अम्बार लगा दे .
धड़कन थमने से पहले रोप दे कर्म-पौध को
जिसका पुष्प सुगंध महेका दे जग को
तेरी अस्थि-चर्म-लहू होंगे आबोदाना,
झांकेगा जिससे नया जमाना जिससे नया जमाना../4/

वो रास्ते, लिखी है तुम ने जिसपे दस्ताने,
लोगों का होगा वो अफ़शाना.
उन रंग बिरंगे ख्वाबों के,
पोषक बना पहनेगा जमाना.  
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर पुकारेगा जमाना
वो खवाबों को हकीकत बनानेवाला
कहाँ गया तू तुझ बिन सूना है आशियाना
कहाँ गया तू हकीकत के रंग ज़माने वाला
तुझ बिन सूना है आशियाना ../5/ वो रही...
           -श्री निवास द्विवेदी यू

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