घर में बैठा देख रहा था(गीत)

गीत

                        घर में बैठा देख रहा था

घर में बैठा देख रहा था,
बागों में फूल महक रहा था 
सपनो का सावन ले अंगड़ाई
झूमे मस्त पवन में अमराई
सीने में मधुर उठ रही थी लहर
बसी थी आँखों में वर्षों पुरानी कहर
शेर-मेरी अपनी मोहब्बत ने मुझे जला दिया था
प्यार की जगह मैंने शराब की बोतल घुट-घुट के पिया था..घर में बैठा देख रहा था ..../1/

किश्मत ने मुझको खूब रुलाया की-
नींद ने फिर कभी न सुलाया
ईद के चाँद हुए अब ख्वाब
रौशनी गुल हुई रहा न माहताब
किसके सहारे अब काटूं ये अंधियारी ज़िन्दगी
तारों के सिवा अंधेरों को भला कौन करेगा बंदगी
वहाँ दुल्हन का सजना सवरना बेकार था
जहाँ अंधेरों का बारात था..घर में बैठा..../2/

शेर-इन मासूम अदावों ने हमें क्या-2 नही सिखाया,
इनकी मदमस्त इशारों पर हमने जवानी लुटाये,.
मेरे दिल में ऐसी कोई गली थी नही
जिस पर ओ चली थी नही
गिनता रहता था पाँव के धुन
हर दिन उसके सपने बुन-बुन
सुबह शाम करता था दुआ
मंजूर शायद उसको न हुआ
हर रात काट रहा था, किसी तरह जालिम दिन बिता रहा था..घर में बैठा..../3/

रास्तों के कांटे तो मंजिल से हैं दूरियां बनाते
मुशाफिर के अदम्य हौषलों को देख हैं झुक जाते
(गर चल दो तो) 
पैरों के चाल से धरती पर निशान बन जाते हैं
अरमानो के फूल बन कर वो खिल जाते हैं
जिन्दगी की उठा-पटक, चढाती है रंग चटक
सुर से सुर मिला के मटक,
कठिनाई तो है इक लटक
शेर- राह में मुश्किलें हो चाहे जितनी मगर
मंजिल को पाना नामुमकिन नही होता,
बादलों के छाने, घटाओं के घिर जाने से
भले रौशनी कम हो लेकिन, सूरज नही मिटता,.
आखीर क्यों उस ख़्वाब के इन्तजार में खोया हूँ
जिसे पता है की मैं अभी नही सोया हूँ
जाम मेरा दोस्त..देता है तसल्ली
कल थे दोस्त वो उड़ाते हैं खिल्ली
आखिर क्यों गाता था वो गीत जो तुम्हे भाता था, क्या थी मेरी भूल..क्या थी मेरी खता    
जो तू नही सिर्फ मैं तुम्हे चाहता था. शायद मैं बेसुरा गाता था..घर में बैठा..../4/
              श्री निवास द्विवेदी यू

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