नमस्कार !
आज 'यूथनजर' में पढ़िए "शेर श्री के" जो कर दे आपको ढेर.
ये जो जिंदगी है हसीन गुलदस्ता
बिकती है आज कल जैसे बादाम और पिस्ता.1.
हसीन खुशबू-ए-बहारों की आपा-धापी
बादलों में सूरज करे जैसे ताका-झाकी.2.
पतझड़ में दरख्तों पर पत्तों की आश
प्यासे को रेगिस्तान में जैसे आती नही सांस.3.
भ्रष्टाचार मिटाओ का होगा मिशन
अब जब धरती पर पैदा होगा ‘किशन’.4.
आज अधिकारों के घन स्वर कर रहे हैं
किन्तु कर्तव्यों के घन-स्वर बिंध रहे हैं.5.
आई सावन संग साँवरी घटा
छाई अनुपम यह है छटा.6.
ये दरख्तों के पत्ते भी सुनाते हैं गीत मधुर
चंचल हवाओं संग जीवन राग सुनते सुमधुर.7.
बलखाती है इठलाती है मधुर-2 मुस्काती है
जीवन के सभी रंग वह प्यार से सजाती है
टेढ़े-मेढ़े रस्तों पर सरपट दौड़ लगाती है
पहाड़ों से आनेवाली चट्टानों पर आँचल फहराती है.8.
सूरज से भी ज्यादा तू चमकता है
चाँद से भी ज्यादा तू दमकता है
बहारों की लग जाएँ तुझे सभी दुआएं
सबका बनके सबका होक तू सब को हसाए.9.
रिमझिम दिन हवाओं को समेटे
चले मचल कर लोटे-लोटे.1.
ये रंगीन कलियाँ हँसती हैं जब खिलखिला कर
रख देती हैं भौरों के पुर्जे हिला कर
मासूम नजरे ये फेरती है जब भौरो पर
तो डूबती हुई कश्ती नजर आ जाती है किनारो पर.2.
हम तोडें तो कली तुम तोड़ो तो फूल
हम करें तो अपराध और तुम करो तो हो गयी भूल.3.
है अगर कोई प्रिये, चिथड़े में भी दिखती है परी
आतप से व्याकुल को पर्णकुटी सुख दायी कहाँ
घास हरी.4.
दर्द बन जाये जब दावा,काँटोंसे आती है तब हवा
सांसों में बसी आहें, मौत से बत्तर जिंदगी-संग जोहे बाहें.5.
आखिर क्यों देते हो मौका शिकायत का
साफ क्यों नही कर देते गला कवायत का.6.
भूखे न मरों यही तो हम चाहते हैं
तभीतो हम खिला-पिला कर
मार देना चाहते हैं .7.
क्यों कर सपने बुनते हो जब टूट जाते हैं
क्यों गढ़ते हो कांच जब फूट जाते हैं.8.
कमल को देखो कैसे छान कर पीता है
कीचड़ से जल को,
कुछ ऐसे ही छान कर पीता हंस भी
घड़े से दूध को.9.
इस तरह आँचल में मुंह छुपा के क्यों
शर्माती है जिन्दगी
स्वविकार क्यों नहीं कर लेती रौश्ने-चिराग
की बन्दगी.1.
जो जलता बुझता आया है जिसकी
न कोई छाया है
जिसको जीवन जीने का राग मधुर
बजाना आया है.2.
वह सम्मा जो चिराग बनती है सम्मा की मासूम हक़ छीन लेती है.U.
वही तो माहताब है रौश्नै-बहारों का दीपक
के सहारों का.
चिराग का कोई तो मकसद होगा जलने का
जैसे नदियों का पहाड़ों से सर-सर बहने का.3.