नमस्कार !
आज "यूथनज़र" में आनंद लीजिये काव्य रस का |
वेरी शार्ट महाभारत
आज "यूथनज़र" में आनंद लीजिये काव्य रस का |
कविता
छल बल पवन, झूमे धरती गगन
घन घर-घराय घोर, बरखा वर वन शोर
कल-कल छल-छल छलकत, मोतिन माटी मरोड़त.
तन,मन भिगोवत, चली जीवन राग गावत
वन,बाग,उपवन,वाटिका भरे जल नयन में देख नाटिका.
मन-मयूर मधुर नृत्य, देख दीन दयाल कृत्य.1.
माँ
लोरी सुनाती है गुनगुनाती है
अपने प्यार से नहलाती है
सोड़ी माँ मेरी प्यार का गीत गाती है
कुलाचों पर मेरी वो मुस्कुराती है
अपने प्यारे के साथ, अपने मुन्ने के साथ
शान से घूमती है.
पिलाकर ढूध प्यार से चूमती है
लोरी..सुनाती....2.
वेरी शार्ट महाभारत
इक कौरव रहे इक पांडव
उनने नारी चीर हरी, उनने उनकी मौत तांडव
लड़-लड़ कट-कट धरी-धूरि समाय रहे
धर्म-धुरी धर्मराज विजय पताका फहराय रहे
व्यास-गणेश, यदु-सुत-भगिनी-पति के रिपु जरत
सूर वीर सूरमा रची महाभारत.4.
शार्ट महाभारत
धृतराष्ट्र के पुत्र सौ थे कौरव
पांडु के पांच पुत्र थे गौरव
हस्तिना की चाहत थी, गांध-सुता-सुतन के
तृण नख हडपलेना चाहते थे धृत भ्रात-सुतन के
धर्मराज के अनुनय पर गले में
जुए का पासा डाला
कुटिल चाल सकुनी की वनवास भाग्य में डाला
गत वनवास सजी सेना रण में उतर
पड़ी कौरव-पांडु सेना
पांडु सेना बन गयी गाजर-मूली
वीर द्रोण,पितामह,कर्ण चढ़ा रहे थे शूली
सारथी कृष्ण को तोड़ प्रतिज्ञां
पितामह के आगे शास्त्रधरी बन की अवज्ञा
सत्य की आज अग्नि-परीक्षा आई है
अर्जुन को रण-राह दिखा द्रोण ने
चक्रव्यूह रचाई है
धर्मराज ने अभिमन्यु संग हाहाकार मचाई है
सुत गल-घोटक को वीर-जनक ने
सूर्यास्त पूर्व सुलाई है. फिर-
कुरुक्षेत्र बन गया रक्त-सरी
कौरव सेन समेत समाय रहे
धरा वीर गंगा-सुत,द्रोण,कर्ण,कपटी-दुर्योधन,अधम दुशासन सब कर्मगती नहाय रहे
तृण-नख न देने वाले तृण-नख
में आज समाय रहे
कुंती-सुत,द्रुपद-सुता-पति धर्म ध्वजा फहराय रहे
कौरव-पांडु की कथा महाभारत गाय रहे.5.
श्री निवास
द्विवेदी “यूथ नजर”
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