नमस्कार !
मैं आपका दोस्त श्री निवास द्विवेदी लेके हाज़िर हूँ आपका पसंदीदा प्रोग्राम "यूथनज़र" और इसमें आज आपकी खिदमत में है 'गुले-कहानी-खुद की सजा'|
बालपन
उमंगों का मेला है.बचकानी हरकतें करना और खिलखिला कर हँसना, कहकहे लगाना व लड़ना-झगड़ना
बालपन के सहज भाव हैं. मस्ती करना ही बालपन को चित्रित करता है. एक मनोरम सजीव
चित्र बनाकर यादों के तकिये में सजा कर रख देता है. मौज-मस्ती में घटी घटनाएँ जीवन को कई खाठ्ठे-मीठे अनुभव दे जाती है. कुछ तो अपनी छाप छोड़ जाती
हैं जिंदगी के कोरे पन्ने पर जिनका रूप स्वीकार कर पाना कभी-2 कठिन जरूर होता है
पर मुश्किल नही. कभी-कभी तो कहानी बन जाती है मौज-मस्ती और मनोरंजन करती रहती है
तमाम उम्र अपना व अपने अपनों का भी. कुछ ऐसा ही था ‘नील’.
नील
बचपन से ही शरारती था और उसे पानी से खेलना पसंद था. पानी से इस तरह उसे प्यार था
की नल खुद चलाने की कोशिश करता और कुछ बूँदें जो निकल अती उस पर तरस खाकर उसे मुंह
में समेटने दौड़ता. इसी कोशिश में एक दिन वह फिसल जाता है और गिर जाता है. जिससे उसकी
आंख तो बच गई पर उसके आँख के निचे एक गहरी चोट लगी जिसका निशान किसी स्टाम्प पेपर
पर लगे मोहर जैसा था. इधर धीरे-धीरे वो बड़ा होता गया और उसकी शरारतों का दायरा
बढता गया. वह अब मस्ती करता था मगर चतुराई के साथ पर मस्ती जब रंग में आती है तो
सब यह भूल जाते हैं की मैं कौन हूँ, कभी- कभी इससे नुकसान भी हो जाता है पर मस्ती
तो मस्ती इस पर जोर चलता किसका है. और बचपन का तो ये हक़ है. नील अपनी मस्ती को
प्यार करता और उसे जीता.कभी चिड़ियों को, कभी कुतों को, बच्चो को और कभी-कभी तो
बूढों को भी छेड़ देता.ये सब उसका शौक था. बच्चे उसे देख कर नए रूट पर पकड़ लेते,
कुत्ते उसके पास से नही गुजरते चिड़ियों की आँखों में तो वो समा ही गया था. ये सब
देख सुन कर नील के घर वालों ने उसे समझाया की बेटे किसी जीव की आजादी में बाधा मत
पहुचाओ. हम सभी जीवों को धरती पर बराबर का हक़ है. हमें अपने बल का इस्तेमाल इन्हें
आतंकित करने के लिए नही.ये अच्छा नही. सोचो अगर तुम्हे कोई परेशान करे या पिंजरे
में बंद दे तो तुम्हे अच्छा लगेगा ? तो वह अपने ही में मस्त उत्तर देता- ये सब मुझसे
डरते हैं. ये मुझे क्या परेशान करेंगे इनकी तो मैं छूट्टी कर दूंगा. और हंसता हुआ
फिर खेलने भाग जाता. बहार जाकर फिर अपने डेली की तरह ही काम पे लग जाता और लोगों
से खेलना उन्हें चिड़ाना शुरू. उसे सबसे ज्याद पास में रह रहे कथित पागल को तंग करने
में मजा आता था. वह उसे कभी ककड़ फेक कर परेशान करता तो कभी उसे गाना गाने के लिए
कहता और चिड़ाता, ना गाने पर पुलिश से पकड़ाने की धमकी देता. ऐसे ही थी उसकी डेली की
जिंदगी.स्कूल के बाद हर दिन उसका ऐसे ही गुजरता. एक दिन मजाक-मजाक में उसने पागल
को पत्थर फेक कर डरना चाहा पर वो जाकर उसको लग गया और खून बहने लगा. वो रोता
बिलखता अपने घर गया और माँ को सब बताया. उसकी माँ दौड़ते हुए नील के घर गयी और नील
की माँ से शिकायात की. नील घर पर ही था उस दिन उसकी पिटाई हुई. और यह बात पूरे घर
में फैल गयी की पिछली बार मना करने के बाद भी उसने नील को तंग किया.सभी उसकी क्लास
लगा रहे थे. उसके भाई को लगा ऐसे तो ये मानेगा नही इसे सबक सिखाना होगा. उसने नील
को एकांत में बुलावाया और उससे प्रश्न पूछना स्टार्ट किया.
तुमने
पागल को क्यों मारा? (शान्त-भाव से)
सर
झुकाए चुचाप खड़ा है नील कोई उत्तर नही..तभी दूसरा- तुम्हे उसने कुछ कहा था? (नील,
एक दम कटघरे में खड़ा हो जैसे )
बोलो
अब बोलते क्यों नही? (प्रश्नों की बौछार के.बी.सी जैसे)
नील(हिमात
जुटाकर) नहीं...
तुम्हार
कोई नुकशान किया उसने?
नील-
नही.
फिर
क्यों पत्थर फेका उस पर?
तुम्हे
पता नही की वो दिमाग से ठीक नही, पागल है.
स्वारी
भैया...अब नही मरूँगा.
क्यों
नही मारोगे?
कोई
जवाब नही निस्तब्ध..
वह
पागल है और पागल को मरना वीरता नही कायरता है नील. तुमने मारा उसे ? नील-हाँ|
मारा
वो भी पागल को. तो तुमने गलती की,की नही की..?
नील-
की.
तो
गलती की सजा भी होती है.और तुमने तो एक बड़ी गलती की है तुम्हे इसके लिए कड़ी सजा
मिलनी चाहिए. सजा के लिए तैयार हो..? नील(हलकी मुस्कान) हाँ.
तो
तुम्ही बताओ क्या सजा दि जाये तुम्हे जिससे तुम्हे ये पता चले कि उसे चोट लागी
होगी और दर्द कैसा हुआ होगा. बताओ..? नील-कान पकड़कर उठक-बैठक मारूं. नहीं-नहीं.
दूसरा कोई. नील- तो मुर्गा बनूँ. क्यों और कोई सजा नही? नील कुछ देर सोचने के बाद
कहता है नही.
अच्छा
तो तूने जिस तरह मेरे सामने अपनी गलती मन ली है उसी तरह जाओ सबको अपनी गलती बताओ
और खुद से मंजूर की गयी सजा भी. वहीँ तब तक मुर्गा बने रहना जब तक तुम्हे ये न लगे
की मैंने अपने किये की सजा पा ली. नील ने सहर्ष ऐसा ही किया.उसकी दृढ इच्छाशक्ति
देखकर घरवाले उसे खुश हुए. उसे सदा अपने गलती को मानने और उसकी सजा खुद से निश्चित
करने को कहा और खूब सारा आशीर्वाद भी दिया.
श्री निवास
द्विवेदी “यूथ नजर”
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