'शक' एक मानशिक कोढ़'(कहानी)-2


नमस्कार!
मैं श्री निवास द्विवेदी आपका अपना होस्ट और दोस्त लेके हाजिर हूँ  प्रोग्राम मंथन  "शक-एक सामाजिक कोढ" की अंतिम कड़ी.

अनल का बुरा हाल था वह चाहता था जो हो नही पा रहा था. वह अपने ही सोच-जाल में फसा जा रहा था.शायद उसको कहीं इस बात की टीस थी की उसकी बीबी जॉब न करे पर वह आवश्यकताओ के बाढ़ में उसको रोक नही पा रहा था. 

अंशिका का काम बहुत अच्छा था उससे उसकी मैडम बहुत प्रसन्न थी और यह भी कहती थी की उसके सिवा वह उसके और सहकर्मियों पर विश्वास नही करती. वह उससे बार-बार पूछती की-कोई दिक्कत हो तो बताना ? पैसे की जरुरत हो तो तुरंत बताना ? और कोई चीज चाहिए हो तो भी बताना मैं मदद करुँगी बस तुम मुझे छोड़ना मत. अंशिका ये सब सुन कर बहुत खुश थी. वह डेली टाइम पर आ जाती और कम ख़त्म होने पर घर चली जाती.एक दिन मैडम ने उसको अपने कमरे में बुलाया और उसे कुछ रुपये देती हुई बोली- यह लो इन पैसों से एक अच्छा सा शूट सिलवा लो अगले हफ्ते मुन्ने के बर्थडे पर तुम्हे उसे पहन कर पार्टी में आना है. अंशिका काफी ख़ुशी से पैसे लेकर मुस्कान के साथ मैडम को थैंकू बोला और बहार चली आई. यह उसके लिए सरप्राइज था क्योकि मैडम ने सिर्फ उसे ही इनवाइट किया था.
 
वह बाजार से अच्छा सा शूट का कापड़ा खरीद कर सिलने के लिए दे देती है. और वह ये सब अनल को बताती है तो वह भी मान जाता है. इन्ही दिनों अनल की गर्मियों की छुट्टियाँ पास हो जाती है और वो अंशिका से घर चलने की तयारी करने को बोलता है. अंशिका उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए पैकिंग में जुट जाती है. मंडे को पार्टी थी और ट्यूजडे को घर निकलना था. अंशिका मंडे को सुबह जॉब पर गयी. वंहा उसे जल्दी छुट्टी मिल गयी ताकि वह तैयार होकर पार्टी के लिए चल सके. पार्टी एक होटेल में थी शाम को. अंशिका मुन्ने व मैडम के साथ एक ही  गाड़ी में होटल पहुचे वंहा उसके पापा पहले से मौजूद होते है जो मेहमानों का स्वागत-सत्कार कर रहे है. बधाई सन्देश और गिफ्ट की चारो तरफ से ले कर सब आ रहे है सब बच्चे को उसके अच्छे भविष्य की शुभकामना दे रहे थे . पार्टी में काफी मौज-मस्ती हुई सब ने एक दूसरे के साथ खूब मस्ती की खाया पिया और घर रवाना हुए.

 रात को 11 बज गए थे तो मैडम ने ड्राइवर से बोला कि अंशिका को गाड़ी में ले जाकर घर छोड़ दो. वह 11:30 बजे घर पहुची तो देखा अनल शराब के नसे में है..वह काफी आग बबूला है अंशिका को देखते ही तिलमिला उठा और बोला तुम को पार्टी में किसने कहा था जाने को ? तुमको घर जाना है उसकी पैकिंग करनी चाहिए या पार्टी अटैंड करनी चाहिए ? पार्टी जरुरी थी या अपना काम ? बच्ची की तुमको को चिंता है की नही ? अपने बच्चे को समहल नही पाती हो और चली है दुसरे के बच्चे को सम्हालने ? यही सब बड़-बड़ाता वह बार-बार उसके तरफ हाथ तानता और फिर खीच लेता है. अंशिका ने चुपचाप अन्दर इंट्री की चेंज किया और बच्ची को लेके लेट गयी. लेकिन अनल का गुस्सा आज शांत होने का नाम नही ले रहा था. वह बार-बार यही प्रशन दोहराता था- क्यों गयी थी तू जब मैंने रोका था ? सुनती है और उसके शराब पीने की वजह से खिन्नता से बोलती है- हफ्ते भर पहले से मैंने हाँ कर रखा है तो क्यों न जाऊं. इतना सुनते ही अनल के गुस्से की लपट उसके कानो तक पहुच गयी.

अनल- अपने मन से चलेगी तू ?

अंशिका- तो हर काम तुझसे पूछ के ही करूँ ? इतने में दो चमाट लगते हुए..

अनल -घर में बच्ची भी है उसका ध्यान कौन  रखेगा ? वह रो-रो कर मुझे परेशान कर रही थी.

अंशिका- बच्ची को मैं ने माँ के पास छोड़ा था वो रो नही रही थी मैंने फोन किया था.

अनल- कल घर जाना है तूने पैकिंग भी की है कैसे चलेगी ?

अंशिका- मैं नही जाती घर.

अनल- क्यों ?
अंशिका- तू सामान पैक करले और जा मैं नहीं जाती. बस फिर क्या था अनल के क्रोध की ज्वाला  को जैसे घी मिल गया हो और वह इतनी भयानक रूप ले चूका था की अंशिका के कान के परदे फटने से बचे इतनी जोर की बिजली कड़की की उसके नयनमेघों से अश्रू-धारा निकल पड़ी. और फिर अपने कलेजे के टुकड़े को गले लगा के वो सो गयी. अनल भी क्रोधाग्नी में बड़-बड़ाता हुआ कब सो गया उसको पता ही नही चला. अगली सुबह वह पश्चाताप के समन्दर में हिचकोले खा रहा था.  

हर कहानी समाज के किसी न किसी सच को बेनकाब करता है आप देख सकते है की किस तरह शक और नशे ने अनल-अंशिका की जिंदगी को तबाहो-बरबाद किया है. किस तरह अंशिका को आर्थिक आजादी के रस्ते में दिक्कते आती है. आखिर कैसे समाज को इस कोढ से बचाया जाये ? क्या वो कदम है जो उठने होंगे इन से निपटने के लिए?

'शक' एक मानसिक कोढ(कहानी)-1



नस्कार!
मै आपका अपना होस्ट और दोस्त श्री निवास द्विवेदी लेके हाजिर हूँ प्रोग्राम "मंथन".
आज आपके सामने समाज का एक सच बेनकाब होगा कृपया अपनी-अपनी आंखे खोल के देखें

 

पत्नी रस्ते से हजारों खुशियाँ समेट कर घर पहुचे लेकिन अगर वह ‘ख़ुशी’ पति को आकर्षित न कर सके तो सब का सब बेकार हो जाता है.


आज कल सभी जोड़े अपने उज्जवल भविष्य के लिए जॉब करते हैं. दोनों मिलके अपने सपनो को साकार करना चाहते हैं.पुरुषों के आफ़िस जाने पर शायद औरतो के मन में कोई विचार आता हो कि वह अपने सहकर्मी(लेडिज) के साथ कैसे व्यवहार करते है पर स्त्री के आफ़िस या काम पे जाने पर पुरुष सम्वर्ग को यह डर होता है कि कहीं....कुछ इसी प्रकार के विचार दाम्पत्य जोवन में विष घोल देते हैं. मैं आपको एक सच्ची घटना सुनाता हूँ.


अनल और अंशिका ने लव मैरेज की हुई है. एक दूसरे से काफी डेटिंग करने के और समझने के बाद. दोनों शादी से पहले जॉब करते थे. शादी की तो अनल अकेले जॉब करता अपने परिवार का खर्च उठता. वो राष्ट्रीय राजधानी में रहते थे और अपनी शादी से काफी खुश थे.उनमे उमंग था वे हर मुश्किल में एक दुसरे का हाथ थामे खड़े रहते थे और इन्ही संघर्ष भरे दिनों में एक नन्ही सी ‘परी” ने जन्म ले लिया. 

बच्ची के जन्म के बाद कुछ दिक्कते आई और उनका सामना अकेले अनल असक्षम था  करने में अतः अच्छा मौका देख कर अंशिका ने पति के साथ कदम से कदम मिलाके चलने का फैसला किया. हाँलाकि अनल चाहता था की वह जॉब न करे पर वह अपने आप को थम ले गया कि अगर दोनों काम नही करेंगे तो अपने ही खर्चे नही चलेंगे और फिर अब तो एक बच्ची भी है. वो दोनों मैट्रिक भी पास नही थे तो फर्स्ट क्लास तो दूर फोर्थ क्लास की जॉब बड़ी मुश्किल से मिल पाती थी उनको.इस प्रकार दोनों जॉब करने लगे. अनल शहर के बड़े कोलेज में गार्ड था और अंशिका एक डाक्टर के यंहा बच्चे के देख-भाल का कम करती थी.वो दोनों खुश थे. उनकी भी सोसायटी में एक अच्छे दम्पति के रूप में पहचान होने लगी. 

धीरे-धीरे बच्ची बड़ी हुई और तीन साल की हो गयी .बगल के घर में बच्चों को आंगनबाड़ी की दीदी पढाती थी. अंशिका डेली उसे वही छोड़ के जॉब पर चली जाती थी. दोपहर में उसकी नानी जो पास में ही रहती उसे लिवा जाती थी फिर वो शाम तक वही भीम-सीरियल देखा करती थी और नानी के साथ मस्ती से रहती थी.शाम को जब मम्मी-पापा को देखती तो ख़ुशी से लिपट जाती. अनल-अंशिका दोनों कुछ न कुछ उसके लिए डेली ले आते थे जिसे पाकर उसकी खुशी आसमान चूमने लगती थी. अनल का छोटा-सा परिवार खुश था सब कुछ अच्छे से चल रह था जॉब करते हुए अंशिका को साल पूरा होने वाला था. दोनों खुश तो थे ही पर इस प्रकार उनकी ख़ुशी को नजर लगी की दोनों एक दूसरे पर शक करने लगे, आये दिन झगड़ने लगे. वजह पति अपने पत्नी को कभी नही चाहेगा की वह कही काम करे या किसी पुरुष से बात करे. ऐसा सोचने से पति के दिल में शिहरन  होने लगती है....एक अनोखा घटना-चक्र अन्दर मचल उठता है. यह घटना अब अनल के साथ घट रही थी. इसी लिए वह परेशान था. वह सोच का शिकार था. उसके पास कोई सुबूत नही थे पर फिर भी... अब शक का क्या करे ? इसकी दवा मनुष्य स्वयं ही हो सकता है. उसके सिवा कोई मेडिसिन नहीं.आज तक ऐसी दवा नही बनी की आदमी की सोच बदली जा सके.हाँ यदि आदमी स्वयं चाहे तो अपने दृढ विश्वास से इस मर्ज को मात दे सकता है. आगे की कहानी अगले अंक में.
                  श्री निवास द्विवेदी  'दी-मैजिसियन ऑफ वर्ड ' 
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                               

आओ मिल के करें सृजन-गीत

नस्कार!

मैं आपका दोस्त श्रीनिवास द्विवेदी लेके हाजिर हूँ आपका अपना प्रोग्राम "काव्यगंगा"

                    1

आओ मिल के करें सृजन, यारों अपना नया चमन.

जहाँ सब को मिले अधिकार, कोई किसी से न करे प्रीतिकार.

सब को सभी में विश्वास, ऐसी जगाओ जीवन ज्योति की आश.

बुझता दीपक फिर जले, बच्चा-बच्चा गले मिले.

मुश्किलों को कर दे आसन,यह है ‘मानव’ युग की फरमान...आओ

 मिल के करें सृजन, यारों अपना नया चमन.                                            2     

बजे शहनाई और हो धूम,चारो तरफ हो मानव तेरी बूम. 

धरती का कण-कण प्यासा,तेरी लहू की है आशा.

लिख दे शांति की नई इबारत,फिर न हो किसी क्रांति की चाहत.

आओ करो प्रितिज्ञा नित जीवन ज्योति जलाओगे.

बन युग प्रवर्तक कर्ममशाल दुनिया को दिखाओगे.”

मुश्किलों को कर दे आसन,यह है ‘मानव’ युग की फरमान...

आओ मिल के करें सृजन,यारों अपना नया चमन.                                        3

धरती को पहना दे धानी चुनरिया,और अम्बर को नीली घांघरिया.

श्वेत रंग का पहन कर सिलवट,जीवन रंग का बदल दे करवट.

आतंक-माओ-अलगावाद,मिटा दे चमन के सभी विवाद.

उठ जा प्यारे करके सिंहनाद.जीवन संग्राम का बजा के तू शंखनाद,

मुश्किलों को कर दे आसन,यह है ‘मानव’ युग की फरमान...आओ 

मिल के करें सृजन, यारों अपना नया चमन.                      

                           4     

जीवन के स्रोत सभी जगायेंगे,नित नव जीवन पुष्प उगायेंगे.     नहीं कमी कोई रह जाएगी,उन्मुक्त चमन सृष्टि स्वयं बनाएगी.

करता जा मानव करत न्यारे,कर्म सुखों के धाम है प्यारे.     फिर ऐसी नींद में तू सोयेगा,जिससे जगाना हो नामुमकिन.     

और हर लफ्ज में सुन-सुन की,बजेगी धुन त-त-धिन.      मुश्किलों को कर दे आसन,यह है ‘मानव’ युग की फरमान...        आओ मिल के करें सृजन,यारों अपना नया चमन.

नोट-मेरी अभिलाषा थी की यह गीत"सत्याग्रह" फिल्म में शामिल हो.







समाज के दर्पण "शिक्षक"



नमस्कार !
आपका अपना होस्ट और दोस्त श्री निवास द्विवेदी लेके हाज़िर है आपका अपना प्रोग्राम 'विचारशाला'।
विचारशाला में हम आज बात करेंगे समाज के दर्पण "शिक्षक"की
There are so many mirrors in the society. But do you know? “Teacher” is one of them.

Mirror- दर्पण वही जिसके सामने हम अपने आप को खोल के रख देते हैं. हर एंगल से देखते है अपने चेहरे को,शरीर को तो कभी अपने बाल को डिफरेंट-डिफरेंट तरह से बनाते है,तो कभी किश प्रक्टिश करते है, कभी स्टंट करते है,तो कभी अलग-अलग तरह की स्टाईल खुद पे ट्राई करते हैं. अपने अन्दर का जो कुछ अपनी जरुरत समझ के मक्खन निकल पाते है वो शारीर से निकल कर शीशे के सामने पेश करते हैं और अगर ओ बेस्ट निकल आता है तो हम कहते हैं-मिरर इज गुड.बट लेट कैन बी थिंक दैट इट इज योर ओन. इफ एनी थिंग इज दैट इन दा वर्ल्ड दैट नाट मेक सेयोर यू इन अबाउट योरसेल्फ दैट इज योर बीलीव. दर्पण वही दिखाता है जो तुम हो वो कभी भी चीटिंग नही करता. शीशे में कोई जादू नही होता बल्कि जब हम मोह-माया छोड़ कर किसी काम पर फोकस हो जाते है तो उसमे आत्मविश्वास झलकता है और वही है जिन्दगी का मक्खन,जो शीशे में देख के हम इतराते हैं.

दुनिया में जितने भी दर्पण है उन सब का स्वाभाविक गुण होता है की ओ तुम्हे कम्फर्ट फील होने देते है. ताकि तुम अपने आप को उनके सामने खोल सको न की बांध के रखो, झिझक,शर्म और झूंठी शानो-शौकत की मकड़-जाल से.

अगर हम शिक्षक समाज का दर्पण होता है”. इस सूक्ति पर गौर करे तो हम देखतें हैं की टीचर को सामज का दर्पण कहा गया है.अतः जो टीचर से कुछ सीखना चाहते है वो पहले ये जान लें की ‘टीचर इज नाट ओनली मोस्ट पॉवरफुल बट आल्सो ए वेरी प्रिसियस मिरर आफ द वर्ल्ड. वन एंड ओनली सेंसटिव  मिरर हू कैन स्पीक,लिसेन,फील एंड ऑब्जरव.

जैसे मिरर के सामने अपने-आप को खोल देते हो, कोई झिझक नही रहती है मन में शारीर में वैसे ही टीचर के सामने भी अपने-आप को खोल दो. और हाँ सावधानी से तुम्हारे दूसरे  मिरर की तरह ही है ये भी जिसके साथ तुम पर्सनल होकर बात करते हो.लेकिन इसमें संवेदनाये होती है औरो में नही इसलिय इससे भवनात्मक जुड़ाव हो सकता है इसका आप के प्रति या फिर आप का इसके प्रति. अतः भावनावो का ख्याल रखें क्योकि आप जानते है- ‘शीशे की उम्र प्याद की’.इनसे(टीचर) से जब भी पर्सनली बात करो तो अपने को हर एंगल से उनकी आँख में देखो तब तुम अपनी सच्ची तस्वीर देख पाओगे. सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी इस बात को ध्यान में रख कर काम करो.और फिर शीशे के भी कुछ वसूल होते है जैसे-


  •     शीशा खुद किसी के पास नहीं जाता.
  •     तुम जैसे हो वैसे दिखाता है,झूठी तारीफ नही करता.
  •        तुम अपने आप को जितना देखना चाहते हो उतना अपने को खोलन होगा.मतलब नथिंग लाइक सीक्रेट.

जिस तरह शीशे के साथ बड़े सावधानी से पेश आते हो उसी तरह टीचर के साथ भी बड़ी सावधानी के साथ पेश आना चाहिए और क्योकि ये ही एक ऐसा आइना है दुनिया में जो हमको इंशान कहलाने का हक़ अता फरमाता है.
वैसे मतलब तो समझ गए न की शीशे से दोस्ती करो जी भरके उसे अपने सुख-दुख से वाकिफ कराओ और अपने हर शेड को पहचानो.