नमस्कार !
आपका अपना होस्ट और दोस्त श्री निवास द्विवेदी लेके हाज़िर है आपका अपना प्रोग्राम 'विचारशाला'।
विचारशाला में हम आज बात करेंगे समाज के दर्पण "शिक्षक"की
There are so many mirrors in the society. But do you know? “Teacher” is one of them.
आपका अपना होस्ट और दोस्त श्री निवास द्विवेदी लेके हाज़िर है आपका अपना प्रोग्राम 'विचारशाला'।
विचारशाला में हम आज बात करेंगे समाज के दर्पण "शिक्षक"की
There are so many mirrors in the society. But do you know? “Teacher” is one of them.
Mirror- दर्पण वही जिसके सामने हम अपने आप को खोल के रख
देते हैं. हर एंगल से देखते है अपने चेहरे को,शरीर को तो कभी अपने बाल को डिफरेंट-डिफरेंट
तरह से बनाते है,तो कभी किश प्रक्टिश करते है, कभी स्टंट करते है,तो कभी अलग-अलग
तरह की स्टाईल खुद पे ट्राई करते हैं. अपने अन्दर का जो कुछ अपनी जरुरत समझ के
मक्खन निकल पाते है वो शारीर से निकल कर शीशे के सामने पेश करते हैं और अगर ओ
बेस्ट निकल आता है तो हम कहते हैं-मिरर इज गुड.बट लेट कैन बी थिंक दैट इट इज
योर ओन. इफ एनी थिंग इज दैट इन दा वर्ल्ड दैट नाट मेक सेयोर यू इन अबाउट योरसेल्फ
दैट इज योर बीलीव. दर्पण वही दिखाता है जो तुम हो वो कभी भी चीटिंग नही करता.
शीशे में कोई जादू नही होता बल्कि जब हम मोह-माया छोड़ कर किसी काम पर फोकस हो जाते है
तो उसमे आत्मविश्वास झलकता है और वही है जिन्दगी का मक्खन,जो शीशे में देख के हम इतराते
हैं.
दुनिया में जितने भी दर्पण है उन सब का स्वाभाविक गुण होता है की ओ तुम्हे कम्फर्ट फील होने देते है. ताकि तुम अपने आप को उनके सामने खोल सको न की बांध
के रखो, झिझक,शर्म और झूंठी शानो-शौकत की मकड़-जाल से.
अगर हम “शिक्षक समाज का दर्पण होता है”. इस सूक्ति पर गौर करे तो हम
देखतें हैं की टीचर को सामज का दर्पण कहा गया है.अतः जो टीचर से कुछ सीखना चाहते
है वो पहले ये जान लें की ‘टीचर इज नाट ओनली मोस्ट पॉवरफुल बट आल्सो ए वेरी प्रिसियस
मिरर आफ द वर्ल्ड. वन एंड ओनली सेंसटिव
मिरर हू कैन स्पीक,लिसेन,फील एंड ऑब्जरव.
जैसे मिरर के सामने अपने-आप को खोल देते हो, कोई झिझक नही रहती है मन में
शारीर में वैसे ही टीचर के सामने भी अपने-आप को खोल दो. और हाँ सावधानी से
तुम्हारे दूसरे मिरर की तरह ही है ये भी
जिसके साथ तुम पर्सनल होकर बात करते हो.लेकिन इसमें संवेदनाये होती है औरो में नही
इसलिय इससे भवनात्मक जुड़ाव हो सकता है इसका आप के प्रति या फिर आप का इसके प्रति.
अतः भावनावो का ख्याल रखें क्योकि आप जानते है- ‘शीशे की उम्र प्याद
की’.इनसे(टीचर) से जब भी पर्सनली बात करो तो अपने को हर एंगल से उनकी आँख में देखो
तब तुम अपनी सच्ची तस्वीर देख पाओगे. सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी इस बात को ध्यान
में रख कर काम करो.और फिर शीशे के भी कुछ वसूल होते है जैसे-
- शीशा खुद किसी के पास नहीं जाता.
- तुम जैसे हो वैसे दिखाता है,झूठी तारीफ नही करता.
- तुम अपने आप को जितना देखना चाहते हो उतना अपने को खोलन होगा.मतलब नथिंग लाइक सीक्रेट.
जिस तरह शीशे के साथ बड़े सावधानी से पेश आते हो
उसी तरह टीचर के साथ भी बड़ी सावधानी के साथ पेश आना चाहिए और क्योकि ये ही एक ऐसा
आइना है दुनिया में जो हमको इंशान कहलाने का हक़ अता फरमाता है.
वैसे मतलब तो समझ गए न की शीशे से दोस्ती करो जी
भरके उसे अपने सुख-दुख से वाकिफ कराओ और अपने हर शेड को पहचानो.
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