नमस्कार!
मैं श्री निवास द्विवेदी आपका अपना होस्ट और दोस्त लेके हाजिर हूँ प्रोग्राम मंथन "शक-एक सामाजिक कोढ" की अंतिम कड़ी.
अनल का बुरा हाल था वह चाहता था जो हो नही पा रहा था. वह अपने ही सोच-जाल में फसा जा रहा था.शायद उसको कहीं इस बात की टीस थी की उसकी बीबी जॉब न करे पर वह आवश्यकताओ के बाढ़ में उसको रोक नही पा रहा था.
अंशिका का काम बहुत अच्छा था उससे उसकी मैडम बहुत प्रसन्न थी और यह भी कहती थी की उसके सिवा वह उसके और सहकर्मियों पर विश्वास नही करती. वह उससे बार-बार पूछती की-कोई दिक्कत हो तो बताना ? पैसे की जरुरत हो तो तुरंत बताना ? और कोई चीज चाहिए हो तो भी बताना मैं मदद करुँगी बस तुम मुझे छोड़ना मत. अंशिका ये सब सुन कर बहुत खुश थी. वह डेली टाइम पर आ जाती और कम ख़त्म होने पर घर चली जाती.एक दिन मैडम ने उसको अपने कमरे में बुलाया और उसे कुछ रुपये देती हुई बोली- यह लो इन पैसों से एक अच्छा सा शूट सिलवा लो अगले हफ्ते मुन्ने के बर्थडे पर तुम्हे उसे पहन कर पार्टी में आना है. अंशिका काफी ख़ुशी से पैसे लेकर मुस्कान के साथ मैडम को थैंकू बोला और बहार चली आई. यह उसके लिए सरप्राइज था क्योकि मैडम ने सिर्फ उसे ही इनवाइट किया था.
वह बाजार से अच्छा सा शूट का कापड़ा खरीद कर सिलने के लिए दे देती है. और वह ये
सब अनल को बताती है तो वह भी मान जाता है. इन्ही दिनों अनल की गर्मियों की
छुट्टियाँ पास हो जाती है और वो अंशिका से घर चलने की तयारी करने को बोलता है.
अंशिका उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए पैकिंग में जुट जाती है. मंडे को पार्टी थी और
ट्यूजडे को घर निकलना था. अंशिका मंडे को सुबह जॉब पर गयी. वंहा उसे जल्दी छुट्टी
मिल गयी ताकि वह तैयार होकर पार्टी के लिए चल सके. पार्टी एक होटेल में थी शाम को.
अंशिका मुन्ने व मैडम के साथ एक ही गाड़ी
में होटल पहुचे वंहा उसके पापा पहले से मौजूद होते है जो मेहमानों का
स्वागत-सत्कार कर रहे है. बधाई सन्देश और गिफ्ट की चारो तरफ से ले कर सब आ रहे है
सब बच्चे को उसके अच्छे भविष्य की शुभकामना दे रहे थे . पार्टी में काफी मौज-मस्ती
हुई सब ने एक दूसरे के साथ खूब मस्ती की खाया पिया और घर रवाना हुए.
रात को 11 बज
गए थे तो मैडम ने ड्राइवर से बोला कि अंशिका को गाड़ी में ले जाकर घर छोड़ दो. वह
11:30 बजे घर पहुची तो देखा अनल शराब के नसे में है..वह काफी आग बबूला है अंशिका
को देखते ही तिलमिला उठा और बोला तुम को पार्टी में किसने कहा था जाने को ? तुमको
घर जाना है उसकी पैकिंग करनी चाहिए या पार्टी अटैंड करनी चाहिए ? पार्टी जरुरी थी
या अपना काम ? बच्ची की तुमको को चिंता है की नही ? अपने बच्चे को समहल नही पाती
हो और चली है दुसरे के बच्चे को सम्हालने ? यही सब बड़-बड़ाता वह बार-बार उसके तरफ
हाथ तानता और फिर खीच लेता है. अंशिका ने चुपचाप अन्दर इंट्री की चेंज किया और
बच्ची को लेके लेट गयी. लेकिन अनल का गुस्सा आज शांत होने का नाम नही ले रहा था.
वह बार-बार यही प्रशन दोहराता था- क्यों गयी थी तू जब मैंने रोका था ? सुनती है और
उसके शराब पीने की वजह से खिन्नता से बोलती है- हफ्ते भर पहले से मैंने हाँ कर रखा
है तो क्यों न जाऊं. इतना सुनते ही अनल के गुस्से की लपट उसके कानो तक पहुच गयी.
अनल- अपने मन से चलेगी तू ?
अंशिका- तो हर काम तुझसे पूछ के ही करूँ ? इतने में दो चमाट लगते हुए..
अनल -घर में बच्ची भी है उसका ध्यान कौन
रखेगा ? वह रो-रो कर मुझे परेशान कर रही थी.
अंशिका- बच्ची को मैं ने माँ के पास छोड़ा था वो रो नही रही थी मैंने फोन किया
था.
अनल- कल घर जाना है तूने पैकिंग भी की है कैसे चलेगी ?
अंशिका- मैं नही जाती घर.
अनल- क्यों ?
अंशिका- तू सामान पैक
करले और जा मैं नहीं जाती. बस फिर क्या था अनल के क्रोध की ज्वाला को जैसे घी मिल गया हो और वह इतनी भयानक रूप ले
चूका था की अंशिका के कान के परदे फटने से बचे इतनी जोर की बिजली कड़की की उसके
नयनमेघों से अश्रू-धारा निकल पड़ी. और फिर अपने कलेजे के टुकड़े को गले लगा के वो सो
गयी. अनल भी क्रोधाग्नी में बड़-बड़ाता हुआ कब सो गया उसको पता ही नही चला. अगली सुबह
वह पश्चाताप के समन्दर में हिचकोले खा रहा था. हर कहानी समाज के किसी न किसी सच को बेनकाब करता है आप देख सकते है की किस तरह शक और नशे ने अनल-अंशिका की जिंदगी को तबाहो-बरबाद किया है. किस तरह अंशिका को आर्थिक आजादी के रस्ते में दिक्कते आती है. आखिर कैसे समाज को इस कोढ से बचाया जाये ? क्या वो कदम है जो उठने होंगे इन से निपटने के लिए?
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