नस्कार!
मै आपका अपना होस्ट और दोस्त श्री निवास द्विवेदी लेके हाजिर हूँ प्रोग्राम "मंथन".
आज आपके सामने समाज का एक सच बेनकाब होगा कृपया अपनी-अपनी आंखे खोल के देखें.
पत्नी रस्ते से हजारों खुशियाँ समेट कर घर पहुचे लेकिन अगर वह ‘ख़ुशी’ पति को
आकर्षित न कर सके तो सब का सब बेकार हो जाता है.
आज कल सभी जोड़े अपने उज्जवल भविष्य के लिए जॉब करते हैं. दोनों मिलके अपने
सपनो को साकार करना चाहते हैं.पुरुषों के आफ़िस जाने पर शायद औरतो के मन में कोई
विचार आता हो कि वह अपने सहकर्मी(लेडिज) के साथ कैसे व्यवहार करते है पर स्त्री के
आफ़िस या काम पे जाने पर पुरुष सम्वर्ग को यह डर होता है कि कहीं....कुछ इसी प्रकार
के विचार दाम्पत्य जोवन में विष घोल देते हैं. मैं आपको एक सच्ची घटना सुनाता हूँ.
अनल और अंशिका ने लव मैरेज की हुई है. एक दूसरे से काफी डेटिंग करने के और समझने
के बाद. दोनों शादी से पहले जॉब करते थे. शादी की तो अनल अकेले जॉब करता अपने
परिवार का खर्च उठता. वो राष्ट्रीय राजधानी में रहते थे और अपनी शादी से काफी खुश
थे.उनमे उमंग था वे हर मुश्किल में एक दुसरे का हाथ थामे खड़े रहते थे और इन्ही संघर्ष भरे दिनों में एक नन्ही सी
‘परी” ने जन्म ले लिया.
बच्ची के जन्म के बाद कुछ दिक्कते आई और उनका सामना अकेले अनल असक्षम था करने में अतः अच्छा मौका देख कर अंशिका ने पति के साथ कदम से कदम मिलाके चलने का फैसला किया. हाँलाकि अनल चाहता था की वह जॉब न करे पर वह अपने आप को थम ले गया कि अगर दोनों काम नही करेंगे तो अपने ही खर्चे नही चलेंगे और फिर अब तो एक बच्ची भी है. वो दोनों मैट्रिक भी पास नही थे तो फर्स्ट क्लास तो दूर फोर्थ क्लास की जॉब बड़ी मुश्किल से मिल पाती थी उनको.इस प्रकार दोनों जॉब करने लगे. अनल शहर के बड़े कोलेज में गार्ड था और अंशिका एक डाक्टर के यंहा बच्चे के देख-भाल का कम करती थी.वो दोनों खुश थे. उनकी भी सोसायटी में एक अच्छे दम्पति के रूप में पहचान होने लगी.
बच्ची के जन्म के बाद कुछ दिक्कते आई और उनका सामना अकेले अनल असक्षम था करने में अतः अच्छा मौका देख कर अंशिका ने पति के साथ कदम से कदम मिलाके चलने का फैसला किया. हाँलाकि अनल चाहता था की वह जॉब न करे पर वह अपने आप को थम ले गया कि अगर दोनों काम नही करेंगे तो अपने ही खर्चे नही चलेंगे और फिर अब तो एक बच्ची भी है. वो दोनों मैट्रिक भी पास नही थे तो फर्स्ट क्लास तो दूर फोर्थ क्लास की जॉब बड़ी मुश्किल से मिल पाती थी उनको.इस प्रकार दोनों जॉब करने लगे. अनल शहर के बड़े कोलेज में गार्ड था और अंशिका एक डाक्टर के यंहा बच्चे के देख-भाल का कम करती थी.वो दोनों खुश थे. उनकी भी सोसायटी में एक अच्छे दम्पति के रूप में पहचान होने लगी.
धीरे-धीरे बच्ची बड़ी हुई और तीन
साल की हो गयी .बगल के घर में बच्चों को आंगनबाड़ी की दीदी पढाती थी. अंशिका डेली
उसे वही छोड़ के जॉब पर चली जाती थी. दोपहर में उसकी नानी जो पास में ही रहती उसे
लिवा जाती थी फिर वो शाम तक वही भीम-सीरियल देखा करती थी और नानी के साथ मस्ती से
रहती थी.शाम को जब मम्मी-पापा को देखती तो ख़ुशी से लिपट जाती. अनल-अंशिका दोनों
कुछ न कुछ उसके लिए डेली ले आते थे जिसे पाकर उसकी खुशी आसमान चूमने लगती थी. अनल का
छोटा-सा परिवार खुश था सब कुछ अच्छे से चल रह था जॉब करते हुए अंशिका को साल पूरा
होने वाला था. दोनों खुश तो थे ही पर इस प्रकार उनकी ख़ुशी को नजर लगी की दोनों एक
दूसरे पर शक करने लगे, आये दिन झगड़ने लगे. वजह पति अपने पत्नी को कभी नही चाहेगा
की वह कही काम करे या किसी पुरुष से बात करे. ऐसा सोचने से पति के दिल में
शिहरन होने लगती है....एक अनोखा घटना-चक्र
अन्दर मचल उठता है. यह घटना अब अनल के साथ घट रही थी. इसी लिए वह परेशान था. वह
सोच का शिकार था. उसके पास कोई सुबूत नही थे पर फिर भी... अब शक का क्या करे ?
इसकी दवा मनुष्य स्वयं ही हो सकता है. उसके सिवा कोई मेडिसिन नहीं.आज तक ऐसी दवा
नही बनी की आदमी की सोच बदली जा सके.हाँ यदि आदमी स्वयं चाहे तो अपने दृढ विश्वास से इस मर्ज को मात दे सकता है. आगे की कहानी अगले अंक में.
श्री निवास द्विवेदी 'दी-मैजिसियन ऑफ वर्ड '
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