वो अन कहे पहलु

नमस्कार !

मै आप का होस्ट और दोस्त श्री निवास द्विवेदी लेके हाजिर हूँ आपका प्रोग्राम "दुनिया शेरो शायरी की".. तो लिजिय आपकी दायर मेरी हाजिरी कबूल कीजिये ...

वो अन कहे पहलु जो आज तक कहे नही
आओ पलते है पिछले ओ पन्ने
लिखे जो धरा की फुलवारी में यहीं-कहीं
वो जो इन मदमस्त फिजाओं के हैं गहने.1.
यह सपेरे वही जो सांप पलते हैं
खुद को डस ले ऐसा लाल पलते हैं
मौत का तमाशा दिखा है पैसा कमाते
सरे-आम मौत के साथ जीना सिखाते.2.
उम्मीद का दमन थाम कर जीवन-निधि में गोते लगा,
मोती मिले या मणि हर्ष से उसे गले लगा.3.
लहरों से खेलना जिनका शौक हो
समन्दर बांहे फैलाये आतुर है उनसे मिलने को.4.
सरहदों की सीमा नहीं जिनके सोच का
समुद्र तक विस्तार करें वो अपने बांहों का.5.
इक-इक त्रुटियों की बना चपाती खा जाओ ताकी
सफलता के उर्जा का भण्डार पाओ.6.
वो खुदा जो जीवन देता और लेता है
खुद के साथ अमृत जहर रखता है
गले में विष का नीला भंडार
नाभि में बहती है अमृत की धार.7.
सच्ची जिन्दगी वही है जिसको विष, अमृत से प्यार है,
पी कर ज़हर सरजमी का अमृत नाम का पियो.
बुलंदी पर सरजमी के नाज हो
की शानी फिर न कोई मिशले-हिन्द के अल्फाज हो.8.
ऐ मानव धरा के तारों ! फ़ैल जाओ सारे
दीप से दीप जले मिट जाएँ अन्धयारे
महताब मिल जाये मेरे सपनो को
मोती मिल जाये मेरे हार को.9.
 

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