रिश्वत (कव्वाली)

नमस्कार !
 मैं आप का होस्ट और दोस्त लेके हाजिर हूँ आपका अपना प्रोग्राम|
यू जिसमे आज हाजिर है एक कव्वाली..
रिश्वत  (कव्वाली)
(कोरस-हाय-2 ये रिश्वत..लूटता है ईमान का अस्मत....हाय-हाय....)
“नश्तो-नाबूद कर देता रिश्वत ईमान का कदम,
“घुटने टेक देते हैं फलसफे मेहरबां होकर बेदम.
रिश्वत बादल है तिजारत का बाँकुरों जरा सुनो,
जला दे इसे पेट की आग सेब वो सूरज बनो.”
रिश्वत रिश्वत हाय-हाय रिश्वत,
अब बन गई है देश के बांकुरों की किस्मत.
रिश्वत का नया रूप चौकीदार,
बैठता है जो हम-दर्दे-दरबार.
रखता है जो रहमो-करम का दस्ता,
चाहिए शोहरत तो भर दो इसका बस्ता.
कारीगर है अफ़सानो का,
क़द्र करता है रिश्वाते-मेहरबानो का .
अर्श से फर्श तक करता है मरम्मत...रिश्वत/1/
ये जंग है लड़ाई है, उम्मीद की अंगड़ाई है.
कोई ये न सोचे ये मामूली लड़ाई है.
इसमें तो सब दाँव पर है लगा
जिस्म भी, जमीर भी बाकि कुछ है बचा
काट दो साँस की डोर बेमुरव्वत...रिश्वत/2/
भेंड़ चाल वालो, अपने लिए मरने वालो.       
जिल्लत में मरते हैं सभी,
मरकर भी जिओ ऐसा सोचा है कभी.
रिश्वत के दीमक से बचो,
अब न अपने लिए जाल रचो.
मिटा दो उस दरख्त को जिससे यह उगता है,
बाकी बचे न इसके बाजुओ में कुव्वत...रिश्वत/3/
रिश्वत है वो जहर, पीकर जिसको उठती है लहर
ईमान पर बरसता है कहर, डूबता है सारा शहर.
आज जानते हो कौन है अव्वल,
रिश्वत देने में जो है मुक्कमल.
नादारदो की है ये किस्मत,
जिद्दो-जहद की उड़ाती है अस्मत.      
भ्रष्टाचार है इसका बाप,
ताले-किस्मत पर बैठा है जो बनकर साँप.
देख कर जिसे मासूमों के हांड जाते है काँप,
रोजगार के ‘हार’ पहनने के खातिर रिश्वत देने जैसा करते है पाप.
ऐ बेरहमो भारत के गौरव के न कौरव बनो,
ना-पाक इरादों की न फरियाद सुनो.
चेत जाओ अपने आदर्शो के बाबत...रिश्वत/4/
खा लो कसम की बनकर अफसरान,
रिश्वत की मरोड़ दोगे हलकान.
आज पूरी हुयी ‘किशन’ की हसरत
दलदले रिश्वत से मिल गयी फ़ुरसत. 
अब आवाज़ आएगी करो कुव्वत करो कुव्वत
कि खुदा को प्यरी हो चुकी है वेश्या-ए-रिश्वत/5/


श्री निवास द्विवेदी यू









 


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