नस्कार!
मैं आपका होस्ट और दोस्त श्री निवास द्विवेदी लेके हाजिर हूँ आपका अपना प्रोग्राम विचारशाला..आज हम बात करेंगे आज कल और आज की जी हाँ आप की केवल और केवल यूथ की प्रौढ़ की जो समाज के विकास के पहिये है....
आज का समय “फटाफट’ का समय है. आधुनिकता का चादर लपेटे यह ‘फटाफट’ समय जिंदगी
और मौत का अंतर फटाफट कम कर रहा है.आज औसत आयु घटती
जा रही. हमारी आधुनिकता व तकनीक निर्भरता जहाँ हमारे तमाम आवश्यकताओं की पूर्ती
फटाफट कर रही है. वहीँ एक अत्यंत गंभीर आवश्कता मौत को भी फटाफट प्रारूप में लांच
करने का मन बना रही है. लेकिन मुझे इसे लेकर चिंता है कि- अगर वैज्ञानिकों ने
अमरत्व का इंजेक्शन बना लिया तो यह परियोजना धरी की धरी रह जायेगी. हम मनुष्य ऐसे
ही नही अत्यंत श्रेष्ठ जीव है, हममें बहुत सारी खूबियाँ भी है जैसे- स्वार्थी
होना. धरती पर हो रहे समस्त परिवर्तन की धुरी यह मानव जाति है, वो भी अपने परम
महान गुण के कारण. क्योकि मनुष्य पत्थरों व दीवारों की पूजा कर सकता है वो भला अपनी
पूजा कैसे नही कर सकता और प्रत्येक प्राणी का धर्म भी है दैहिक सुख-समृद्धी के लिए
हाथ पाँव मरना. अतः हम अपने लिए स्वविवेक के अनुसार अच्छी से अच्छी वस्तु का चयन
करते है. चाहे वह कसौटी पर खरा न उतरे तब भी.
मानव निरंतर नये कार्य सम्पादन में व्यस्त है वह इस प्रकार इन चमचमाती
रंगीनियों के पीछे दौड़ रहा है कि खुद किस रास्ते उनके पास पंहुचा था भूल जाता है
और फिर कभी नही लौट पा रहा है, आगे-आगे और दुनियां से आगे निकल जाता है लेकिन आखिर
तक संतुष्ट नही हो पाता अपने आप से. अपनी आँख की भूख वह मिटने में असफल रह ही जाता
है. हर कदम पर कामयवी पाता मनुष्य अपने अतीत को ख़ुशी से नही देख पा रहा है. वह
अपने भविष्य पर ही दौड़ता रहता है. जहाँ है वहां खुश नही परन्तु जहाँ वह जाना चाहता
है वहां की अप्रतिम कल्पना कर दो पल खुश हो लेता है और उसके हाथों में जो ख़ुशी
वर्तमान में है वह ढाह न सह कर बालू में धूप की गर्मी से पानी की तरह गुल हो जाती
है. इस बीच में नित नये आयाम की खोज करता
वह ज़िन्दगी का सफर तय कर चुका होता है.
इन सभी परिस्थितियों में आज युवा व प्रौढ़ आपस में सामंजस्य नही बिठा पा रहा
है. ‘प्रौढ़’ जहाँ काफी कुछ परिस्थितियों की सामना करते-करते प्रौढ़ हो गये हैं वहीं
युवा मन उल्लास व उमंग के साथ नवीनता के तरफ आकर्षित होता है. युवा सभी वस्तुओं को आशा भरी निगाहों
से देखता है जबकि वयस्क या प्रौढ़ वर्ग जो असफलतों के कारण निराशा का गर्त देख चुका
होता है वह सामान्य व्यवहार करता है सभी वस्तुओं के प्रती और इसीलिये युवा वर्ग व
प्रौढ़ वर्ग साथ-साथ नही चल पा रहे है जिसका खामियाजा आज समाज को भुगतना पड़ता है.
नौजवान अपना कार्य सम्पन्न करने के लिए मद्दत चाहते है तो किसी वयस्क या प्रौढ़ को
विकलप के रूप में स्वीकार करते हैं, असली किरदार के रूप में नही. यही प्रौढ़ के साथ
घट रहा है वह जितना प्रौढ़ के साथ सहज महसूस करते हैं उतना युवा के साथ नहीं पर यह
सही है की युवा शक्ती व जोश को आशा के रूप में लेते हैं.
युवा और प्रौढ़ का नया का संस्कार पिता व पुत्र का ही समझो तब समझना भी और आसन
होगा. युवा पुत्र और प्रौढ़ पिता में आपसी मतभेद सबने देख सुना हुआ है. युवक अक्सर
‘सठिया गये है’ प्रौढ़ ‘सरफिरे’ जैसे संबोधन से एक-दुसरे को आच्छादित करते हैं. यह
सब विचारों में फासले(नवीनता&प्रौढ़ता) के कारण है.युवा आशा व जोश से पूर्ण
होने के कारण सभी तरफ आकर्षित होता है और यथा-शीघ्र मनवांछित की प्राप्ति चाहता है
किन्तु यह सत्य है कि “सब कुछ सभी को समान रूप से नही मिलती.” इस पर गौर फरमाता प्रौढ़
वर्ग जब आकर्षण का तिलिस्म अपने अनुभवों के एक फूंक से तोड़ देता है. तब युवा मन
खिन्न हो उठता है. और वह सामने वाले को अपने उन करीबी अशुभ चिंतकों में शामिल कर
लेता है जो उसे दरिया में धकेल देना चाहते है. लेकिन विश्व में नितनूतन हो रहे
कार्य युवा शक्ती को बढ़ावा दे रहे रहे है और प्रौढ़ के अपने असफल अनुभवों को सब पर
सामान रूप से न लागू करने का प्रमाण देते हैं. यह जरूरी नही कि आप असफल हुए इसलिए
अगला भी असफल होगा क्योकि प्रत्येक व्यक्ती का जीवन चक्र निर्धारित होता है. किस
व्यक्ति का सफल क्षेत्र कौन बनेगा व असफल क्षेत्र कौन बनेगा यह सब तय होता है.
आप दुनिया के महान से महान व्यक्ती का नाम ले फिर उसका अपना जीवन देखें. अगर
आपने पूर्ण रूप से देख लिया तो आपको पहले उनके संघर्ष करने की अटूट जिजीविषा पर
गर्व होगा पर जब उसका चित्रण स्वयं को केंद्र में रखके करोगे तो दिल शिहर उठेगा
.जबकि आज आप उनसे बेहतर युग में रह रहे हो. आप के महानतम व्यक्तित्व की कुर्सी
पिछले युगों के मुकाबले आसान है लेकिन न संघर्ष तब किसी का पीछा छोड़ता था और न अब.
जो संघर्ष को पीछे छोड़ता है वो ही महानता के शिखर पर आरूढ़ होता है.
नोट- अगला अंक लेके हम फिर हाज़िर होंगे तब तक लिए नमस्कार.
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