अगर तुम्हें लगे कि मैं गर्त में हूं और मेरे पैर दुख रूपी जाल के ऊपर हैं जो लगातार मुझे डूबो रहा है और निराशा की ज्वाला अपनी लपटों से तुम्हें आहत कर रही हो, आशा के सूर्य अस्ताचल हो जाने वाले हों, कोई सहायता नहीं मिल रही हो असीम गहराई में पहुंच गए हो जहां मानव सहायता नहीं कर सकता अगर तब भी तुम ईश्वर पर विश्वास करने का अतुल्य साहस कर सके तो तुम्हारी रक्षा स्वयं तुम्हारी गर्त ही करेगी जो तुम्हें हन्ता बनी जा रही थी। ईश्वर विश्वास है समस्त विराट संसार उसके शरीर है उसे कहीं भी कभी भी यात्रा करने की आवश्यकता नहीं। समस्त पदार्थ जो ब्रह्मांड में उपस्थित है वह ईश्वर के संपूर्ण शरीर का घटक है। अतः अगर हम इतना दुस्साहस कर सकें कि जल, मिट्टी, वायु, अग्नि और आकाश या संपूर्ण प्रकृति जो भी है ईश्वर है तो हमें कभी कहीं किसी प्रकार का भय नहीं। भय का कारण हमारा अपना दृश्य अज्ञान है जो वस्तु हमें निर्भय लगती है वह भी भयावह हो सकती है। किंतु हम दृश्य इंद्रियों को आभास करा देते हैं कि अमुक वस्तु से भय नहीं और अमुक वस्तु से भय। यही भयावह विचार हमें अपनी प्रकृति या अपना बनने में बाधा है। भय के कारण हम नदी की बहती धारा को अपना जीवन नहीं मानते किन्तु नल से निकलने वाली धारा को जब ग्लास या किसी पात्र में भर लेते हैं तो "जल ही जीवन है" कहने में कोई संकोच नहीं करते। सर्प जैसे विषैले जीव को जीवन का काल मानते हैं किंतु जब सपेरे उसे गले में लपेटकर लोगों को दिखाते है और उसे इस पर पुरस्कार स्वरूप अन्न, वस्त्र प्राप्त होते हैं तो वह कहता है "यही तो मेरी रोजी-रोटी है।"अर्थात जो काल था जीवन का वह जीवन का आधार निकला, रक्षक निकला। जीवन के लिए वरदान साबित हुआ तो अब विचार करने योग्य बात है कि क्या वास्तव में हम मनाव असंयम का शिकार हैं ? आखिर हमारी सोच का, आज का आधार क्या है ? सोचने की भूमि जब तक सभी गुणों को धारण नहीं कर पाएगी ऐसा संभव ही नहीं है कि हम समस्त प्रकृति से गले मिल सके। भारत देश की सीमा की तरह हमने अपने सोचने की, विचार करने की एक सीमा बना रखी है। यही सीमा हमारी अपनी बौद्धिक क्षमता को अंधकार प्रदान करता है और हम आगे नहीं जा पाते। इस प्रकार से कूपमंडूक बन बैठाते हैं खुद को हम। अपने ही विचारों के जाल में उलझे हुए फिरते हैं ऐसे विचार जो परिकल्पना है आधार ना होते हुए भी हमने सुना है 'ऐसा-ऐसा' इसलिए मान बैठते हैं।बाघ बड़ा खतरनाक जानवर है इसलिए उससे मानव जाति नफरत करती है तथा भय भी रखती है इसलिए कि वह अपने शरीर के पोषण के लिए जानवरों को अपना निवाला बना लेता है। वह खतरनाक है इस आधार पर कि वह जीवो को अपना बनाता है तो मनुष्य सबसे खतरनाक है। वह तो पशु-पक्षी, वनस्पति तक को अपना निवाला बना रहा है। रिंग मास्टर उसे अपने इशारों पर नचाता है, लोग देखते हैं। उनको भी वह आहत नहीं करता। फिर वह भयावह जानवर कैसे हुआ ? खाने के लिए शेर भी शिकार करता है और मनुष्य भी। फिर शेर क्यों, मनुष्य क्यों नहीं..शायद इसीलिए कि वह मनुष्य की तरह वक्तव्य क्षमता नहीं रखता या फिर वह वास्तव में खतरनाक है। हिरण बड़ा प्यारा जानवर है, तोता बहुत अच्छा पक्षी है, मोर, कोयल, गाय, भैंस, बकरी इत्यादि यह सभी अच्छे हैं, बड़े प्यारे जानवर हैं कहते हुए हम हमारी जुबान शोभा पती है। भेड़िया, सियार, चीता, बाघ, कौवा, चील, गिद्ध इत्यादि क्यों नहीं? दरअसल यह हमारी मानसिक कमजोरी है। जो जानवर हमारे काम आते या जिनसे हमें स्वयं का लाभ होता है हम उन्हें अच्छे की संज्ञा देते हैं बल्कि जिनसे ऐसा नहीं उन्हें खतरनाक की संज्ञा देते हैं। कारण मानव अपने सुख के सिवा अच्छा किसी वस्तु को नहीं समझता। अतः जिसमें उसे सुख है वही अच्छा है यह धारणा मनुष्य को सुख का दास बना बैठा और मनुष्य अपनी स्वतंत्रता बेच बैठा।
हमें बचपन में जो अच्छा बुरा बताया गया वही हम भी अच्छा बुरा मानते गए यहां यह बात विमर्श की है कि- 'मान लेना' से 'वास्तविक होने' का क्या ताल्लुक ? लेकिन नहीं यहां द्वन्द है अगर यह नहीं मानते कि हम किसी के पुत्र हैं, भाई हैं, बहन हैं, माता है तो संसार में कोई संबंध ना पनपता। कोई किसी का नहीं होता। आप देख सकते हैं जो लोग अपने सगे-संबंधियों के घर नहीं जाते उनसे आमने-सामने होने पर भी बात नहीं करते और नहीं करना चाहते दरअसल वह मान चुके होते हैं कि वह हमारे कुछ नहीं। वहीं अगर कोई बात आप किसी के समक्ष रख रहे हो अगर वह बात अधिक लोगों को पसंद आई तो मानना पड़ेगा सबको अतः 'मानने का' या 'मान लेने' का रोल बहुत अहम है हमारी लाइफ में हम किसी एक को नकार सकते हैं कि तुम्हारे मान लेने से क्या। लेकिन सबको नहीं क्योंकि यह जो हमारा मस्तिष्क है उसमे हम जो बीज रूपी विचार बोते हैं उस बीज की गुणवत्ता के आधार पर विचारूपी शाखा प्रस्फुटित होगी अगर हमारी लैंड फर्टाइल है तो अर्थात विचार करने की क्षमता है तो। हमारा कान बहुत बड़ा क्रेता है जो आवाज के बाजार का वह सब कुछ खरीद सकता है जो उसे मिल जाए उसका भंडार विशाल है वह कभी नहीं भरता।
इस प्रकार से जो चीजें हम ने सुन ली होती है वही हमारे मानने का आधार होती हैं जिसके ऊपर हम अपनी बिल्डिंग खड़ी करते हैं।
हमारे मानने के आधार पर कोई कुछ भी मान सकता तथा कुछ भी धारणा बना सकता है। संसार में इसी आधार पर विभिन्न मत वाले लोग भी अस्तित्व को प्राप्त हुए। दुनिया का कोई एक कार्य ले लो उसे करने वाले दुनिया के हर कारीगर का अपना अंदाज हुआ अपना एक अलग मानना होगा जबकि कार्य एक ही है उसकी सराहना भी मिलेगी भर्त्सना भी हो भी मिलेगी।
✏श्रीनिवास द्विवेदी।
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