और से प्यार

पूर्णिमा की रात, और तुम हो साथ।
बाहों में बाहें डाले, एक दूजे के कदम साधे। आंखों में ताका-झांकी करते,
जुबानी चक्की चलाते। चले जा रहे हैं,
न कदमों की कोई राह तय है न दूरी,
बस उसके साथ बढ़ते हर कदम में,
मेरी चाहत है अधूरी।
जाने क्यों तब रास्ते अच्छे लगते हैं,
मीलों चलकर भी हम नहीं थकते हैं ।
जब उसके साथ में हम भागते रहते हैं,
चलते रहते हैं।
चलते-चलते घर बाढ गांव सब पीछे छुट जाता है, पर न जाने क्यों वह तनिक भी याद ना आते हैं। सड़क की मुफ्त की खुशी भी नजर नहीं आती, गर नजर आती है तो वह कैसी बातें करती है, बलखाती है।
वह सारे नजारे जो दिल हल्का कर जाते थे,
अब पता नहीं वह देखने हम कब जाते जाते थे। अब यह भी याद नहीं कि चौक के कार्नर वाली दुकान पर मैंने कब गुपचुप खाए,
बस याद है तो इतना कि उसने गुपचुप खाए,
और पैसे मैंने चुकाए।
उसेने प्यार से चंचल हाथों से एक निवाला जो खिलाया, मैं मिनटों उसका आनंद लेता रहा।
इतने में उसने सौ का पत्ता सीधा कर दिया,
तब जाकर पता चला, मैं तो लूट नगर में आ गया। अभी तक तो मेरे पैरों तले थी जमीं,
पर जब मेरे आंखों के सामने वह बाइक वाले के साथ फुर्र हुई।
तब तो मैं धस गया सीधे-सीधे जमीं।
हाय-बाय तो बाद की बात,
वह तो उसके कानों से लग लगी फुसफुसाने,
और मेरे उगते अरमानों को लगी दफनाने।
मैं बार-बार बेहोश हुआ, सड़क पर गिरकर जमीन दोज हुआ।
फिर जाने क्या हुआ। अगर होश में आया,
तो सोचेंगे था यह क्या।
क्यों मैं भला क्यों खुद से हुआ दरकिनार,
करने लगा किसी से, और से प्यार।✏श्रीनिवास द्विवेदी ।

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