नमस्कार !
आपका अपना होस्ट और दोस्त "श्री" लेके हाजीर प्रोग्राम नव गीत, कुछ आपकी और कुछ अपनी भावनाओं की प्रीत
शेर-सच तो यह
है की सच कहने से डरता हूँ.
हर लफ़्ज में उसका नाम रटता रहता हू.
कविता
1.मानव दृग चंचल ऐसे, कानन मृग
चंचल जैसे.
नव लतिकाओं से अटखेलियाँ करते,
चक्षु पथों से बसंत हिये में
भरते.
कंचन-योवन
नवल-मंजरियाँ, हरषे बिखरी रवि-रश्मियाँ.
2.रजनी, गंधा,
चम्पा,चमेली, बहुत सारी हैं अलबेली.
रहती कहाँ कब
ये किस गली,
हवाओं के संग
झूमती चली.
आशाएं सजाएँ
मानो कली,डगर-डगर गली-गली.
बनाये हैं राह
आशुओं ने चेहरे पर हमारे,
गम के आंशू बन गए जीने के सहारे.
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