साहस और विश्वास

अगर तुम्हें लगे कि मैं गर्त में हूं और मेरे पैर दुख रूपी जाल के ऊपर हैं जो लगातार मुझे डूबो रहा है और निराशा की ज्वाला अपनी लपटों से तुम्हें आहत कर रही हो, आशा के सूर्य अस्ताचल हो जाने वाले हों, कोई सहायता नहीं मिल रही हो असीम गहराई में पहुंच गए हो जहां मानव सहायता नहीं कर सकता अगर तब भी तुम ईश्वर पर विश्वास करने का अतुल्य साहस कर सके तो तुम्हारी रक्षा स्वयं तुम्हारी गर्त ही करेगी जो तुम्हें हन्ता बनी जा रही थी। ईश्वर विश्वास है समस्त विराट संसार उसके शरीर है उसे कहीं भी कभी भी यात्रा करने की आवश्यकता नहीं। समस्त पदार्थ जो ब्रह्मांड में उपस्थित है वह ईश्वर के संपूर्ण शरीर का घटक है। अतः अगर हम इतना दुस्साहस कर सकें कि जल, मिट्टी, वायु, अग्नि और आकाश या संपूर्ण प्रकृति जो भी है ईश्वर है तो हमें कभी कहीं किसी प्रकार का भय नहीं। भय का कारण हमारा अपना दृश्य अज्ञान है जो वस्तु हमें निर्भय लगती है वह भी भयावह हो सकती है। किंतु हम दृश्य इंद्रियों को आभास करा देते हैं कि अमुक वस्तु से भय नहीं और अमुक वस्तु से भय। यही भयावह विचार हमें अपनी प्रकृति या अपना बनने में बाधा है। भय के कारण हम नदी की बहती धारा को अपना जीवन नहीं मानते किन्तु नल से निकलने वाली धारा को जब ग्लास या किसी पात्र में भर लेते हैं तो "जल ही जीवन है" कहने में कोई संकोच नहीं करते। सर्प जैसे विषैले जीव को जीवन का काल मानते हैं किंतु जब सपेरे उसे गले में लपेटकर लोगों को दिखाते है और उसे इस पर पुरस्कार स्वरूप अन्न, वस्त्र प्राप्त होते हैं तो वह कहता है "यही तो मेरी रोजी-रोटी है।"अर्थात जो काल था जीवन का वह जीवन का आधार निकला,  रक्षक निकला। जीवन के लिए वरदान साबित हुआ तो अब विचार करने योग्य बात है कि क्या वास्तव में हम मनाव असंयम का शिकार हैं ? आखिर हमारी सोच का, आज का आधार क्या है ? सोचने की भूमि जब तक सभी गुणों को धारण नहीं कर पाएगी ऐसा संभव ही नहीं है कि हम समस्त प्रकृति से गले मिल सके। भारत देश की सीमा की तरह हमने अपने सोचने की, विचार करने की एक सीमा बना रखी है। यही सीमा हमारी अपनी बौद्धिक क्षमता को अंधकार प्रदान करता है और हम आगे नहीं जा पाते। इस प्रकार से कूपमंडूक बन बैठाते हैं खुद को हम। अपने ही विचारों के जाल में उलझे हुए फिरते हैं ऐसे विचार जो परिकल्पना है आधार ना होते हुए भी हमने सुना है 'ऐसा-ऐसा' इसलिए मान बैठते हैं।बाघ बड़ा खतरनाक जानवर है इसलिए उससे मानव जाति नफरत करती है तथा भय भी रखती है इसलिए कि वह अपने शरीर के पोषण के लिए जानवरों को अपना निवाला बना लेता है। वह खतरनाक है इस आधार पर कि वह जीवो को अपना बनाता है तो मनुष्य सबसे खतरनाक है। वह तो पशु-पक्षी, वनस्पति तक को अपना निवाला बना रहा है। रिंग मास्टर उसे अपने इशारों पर नचाता है, लोग देखते हैं। उनको भी वह आहत नहीं करता। फिर वह भयावह जानवर कैसे हुआ ? खाने के लिए शेर भी शिकार करता है और मनुष्य भी। फिर शेर क्यों, मनुष्य क्यों नहीं..शायद इसीलिए कि वह मनुष्य की तरह वक्तव्य क्षमता नहीं रखता या फिर वह वास्तव में खतरनाक है। हिरण बड़ा प्यारा जानवर है, तोता बहुत अच्छा पक्षी है, मोर, कोयल, गाय, भैंस, बकरी इत्यादि यह सभी अच्छे हैं, बड़े प्यारे जानवर हैं कहते हुए हम हमारी जुबान शोभा पती है। भेड़िया, सियार, चीता, बाघ, कौवा, चील, गिद्ध इत्यादि क्यों नहीं? दरअसल यह हमारी मानसिक कमजोरी है। जो जानवर हमारे काम आते या जिनसे हमें स्वयं का लाभ होता है हम उन्हें अच्छे की संज्ञा देते हैं बल्कि जिनसे ऐसा नहीं उन्हें खतरनाक की संज्ञा देते हैं। कारण मानव अपने सुख के सिवा अच्छा किसी वस्तु को नहीं समझता। अतः जिसमें उसे सुख है वही अच्छा है यह धारणा मनुष्य को सुख का दास बना बैठा और मनुष्य अपनी स्वतंत्रता बेच बैठा।

हमें बचपन में जो अच्छा बुरा बताया गया वही हम भी अच्छा बुरा मानते गए यहां यह बात विमर्श की है कि- 'मान लेना' से 'वास्तविक होने' का क्या ताल्लुक ? लेकिन नहीं यहां द्वन्द है अगर यह नहीं मानते कि हम किसी के पुत्र हैं,  भाई हैं, बहन हैं, माता है तो संसार में कोई संबंध ना पनपता। कोई किसी का नहीं होता। आप देख सकते हैं जो लोग अपने सगे-संबंधियों के घर नहीं जाते उनसे आमने-सामने होने पर भी बात नहीं करते और नहीं करना चाहते दरअसल वह मान चुके होते हैं कि वह हमारे कुछ नहीं। वहीं अगर कोई बात आप किसी के समक्ष रख रहे हो अगर वह बात अधिक लोगों को पसंद आई तो मानना पड़ेगा सबको अतः 'मानने का' या 'मान लेने' का रोल बहुत अहम है हमारी लाइफ में हम किसी एक को नकार सकते हैं कि तुम्हारे मान लेने से क्या। लेकिन सबको नहीं क्योंकि यह जो हमारा मस्तिष्क है उसमे हम जो बीज रूपी विचार बोते हैं उस बीज की गुणवत्ता के आधार पर विचारूपी शाखा प्रस्फुटित होगी अगर हमारी लैंड फर्टाइल है तो अर्थात विचार करने की क्षमता है तो। हमारा कान बहुत बड़ा क्रेता है जो आवाज के बाजार का वह सब कुछ खरीद सकता है जो उसे मिल जाए उसका भंडार विशाल है वह कभी नहीं भरता।
इस प्रकार से जो चीजें हम ने सुन ली होती है वही हमारे मानने का आधार होती हैं जिसके ऊपर हम अपनी बिल्डिंग खड़ी करते हैं।
हमारे मानने के आधार पर कोई कुछ भी मान  सकता तथा कुछ भी धारणा बना सकता है। संसार में इसी आधार पर विभिन्न मत वाले लोग भी अस्तित्व को प्राप्त हुए। दुनिया का कोई एक कार्य ले लो उसे करने वाले दुनिया के हर कारीगर का अपना अंदाज हुआ अपना एक अलग मानना होगा जबकि कार्य एक ही है उसकी सराहना भी मिलेगी भर्त्सना भी हो भी मिलेगी।
✏श्रीनिवास द्विवेदी।

मझधार में है नैया

मझधार में है नैया है शेरावाली मैया,
मझधार में है नैया तेरे सिवा नहीं कोई और है खेवईया।
हे मैया शेरावाली मैया मझधार में है नैया।1।

बेड़ा पार तू लगा दे, उजड़े हुए चमन को हां बिखरे हुए आंगन को फिर से तू सजा दे।
ओ शेरावाली मैया नैया पार तू लगा दे,
राह भटके राही को किनारा लगा दे।
बेड़ा पार तो लगा दे।
ओ शेरोंवाली मैया मझधार में है नैया,
तेरे सिवा नही कोई और है खेवईया।2।

अपनी शरण में लगा ले मझधार में है नैया,
ओ शेरों वाली मैया नैया पार लगा दे,
तेरे बिन कोई और नहीं है खेवईया,
ओ शेरोंवाली मैया मझधार में है नैया।3।
✏श्रीनिवास द्विवेदी।

मेरे दोस्तों मेरे साथ आओ

मेरे दोस्तों मेरे साथ आओ,
गर्लफ्रेंड को भी लाओ।
सैर कराओ, एक दूसरे में घुल मिल जाओ।
लाइफ की बोरिंग हटाओ,
चलो आज लाइफ फंक्शन मनाओ।
अरे झूमो गाओ नाचो कूदो, एक दूसरे में डूबो।
ए मस्ती नहीं है सस्ती,
गर मिले किश्ती में भी तो संभालो।
आज दिल की बस्ती के नुक्कड़ चौराहे के हर द्वार सजाओ,
खुशियों को पकड़ कर जकड़ अपनी बाहों में भर लो।
और बोलो कम कम हैप्पीनेस कम गोगो सैडनेस गो कम कम हैप्पीनेस गोगो सैडनेस गो ।1।

बाजार में सब कुछ बिकता है यारों,
जिंदगी इस के चक्कर में पिसती है यारों।
फिर भी प्यार वफ़ा चैन नींद नहीं मिलता,
अब जरा सोचो और दिमाग चलाओ यह भला कहां मिलता?
दुकानों में ना ना ना, बाजारों में मोहल्लों में ना ना ना, उसमें भी नहीं लंदन में नो नो नो फिर कहां मिलेगी?
तो सुनो अपनों में प्यार गैरों में वफा महबूब के साथ चैन और खुद के साथ नींद।
ओके फ्रेंड्स एंजॉय लाइफ फंक्शन, मेक हर्ट डेकोरेशन, दिस इज द हाॅली फंक्शन।
बी टेक वेकेशन, माय हर्ट्स सुड डू मोशन इमोशन।
ओके. यस फ्रेंड नॉउ स्टार्ट फॉर वेकेशन।
कम कम क्रेजीनेस कम.. गोगो फ्रीजनेस गो कम कम क्रेजिनेश कम गोगो फ्रीजनेस गो।2।

कॉफी हाथ में हो जब, गर्लफ्रेंड साथ में हो जब। पॉकेट में कैश हो जब गाड़ी में रेस हो जब, होती है फुल मस्ती कैश तब।
ओय SN क्या बात हैक्या बात है,
तेरी तो लाइफ हाथ है।
एक हाथ में कैश, दूजे हाथ में ऐश।
कुड़ियों का है तू फरमाइश,
पूरी कर दे उनकी ख्वाहिश।
दे आॅल सेज हेलो माय एस एन।
आई ऐम इन इमोशन... एंड लेट्स डू मोशन, लेट्स ब्रेकअप माई फ्रस्ट्रेशन...।
ओ एस एन ब्रेकअप फ्रस्ट्रेशन एंड लेट्स मेक सम मोशन।
✏श्रीनिवास द्विवेदी।

और से प्यार

पूर्णिमा की रात, और तुम हो साथ।
बाहों में बाहें डाले, एक दूजे के कदम साधे। आंखों में ताका-झांकी करते,
जुबानी चक्की चलाते। चले जा रहे हैं,
न कदमों की कोई राह तय है न दूरी,
बस उसके साथ बढ़ते हर कदम में,
मेरी चाहत है अधूरी।
जाने क्यों तब रास्ते अच्छे लगते हैं,
मीलों चलकर भी हम नहीं थकते हैं ।
जब उसके साथ में हम भागते रहते हैं,
चलते रहते हैं।
चलते-चलते घर बाढ गांव सब पीछे छुट जाता है, पर न जाने क्यों वह तनिक भी याद ना आते हैं। सड़क की मुफ्त की खुशी भी नजर नहीं आती, गर नजर आती है तो वह कैसी बातें करती है, बलखाती है।
वह सारे नजारे जो दिल हल्का कर जाते थे,
अब पता नहीं वह देखने हम कब जाते जाते थे। अब यह भी याद नहीं कि चौक के कार्नर वाली दुकान पर मैंने कब गुपचुप खाए,
बस याद है तो इतना कि उसने गुपचुप खाए,
और पैसे मैंने चुकाए।
उसेने प्यार से चंचल हाथों से एक निवाला जो खिलाया, मैं मिनटों उसका आनंद लेता रहा।
इतने में उसने सौ का पत्ता सीधा कर दिया,
तब जाकर पता चला, मैं तो लूट नगर में आ गया। अभी तक तो मेरे पैरों तले थी जमीं,
पर जब मेरे आंखों के सामने वह बाइक वाले के साथ फुर्र हुई।
तब तो मैं धस गया सीधे-सीधे जमीं।
हाय-बाय तो बाद की बात,
वह तो उसके कानों से लग लगी फुसफुसाने,
और मेरे उगते अरमानों को लगी दफनाने।
मैं बार-बार बेहोश हुआ, सड़क पर गिरकर जमीन दोज हुआ।
फिर जाने क्या हुआ। अगर होश में आया,
तो सोचेंगे था यह क्या।
क्यों मैं भला क्यों खुद से हुआ दरकिनार,
करने लगा किसी से, और से प्यार।✏श्रीनिवास द्विवेदी ।

हाय क्या कहेंगे लोग

दुनिया का सबसे बड़ा रोग,
हाय क्या कहेंगे लोग।
जब मैं अपने ख्वाबों को जी नहीं पाऊंगा,
तब क्या कहेंगे लोग,
प्यासे पंछी की तरह तडफडाउंगा।
हाय क्या कहेंगे लोग।1।

पब्लिक मॉक न्यूज़ माॅक,
पैरेंट माॅक गर्लफ्रेंड माॅक बन जाऊंगा।
हाय बेशर्म भला मैं कैसे जी पाऊंगा।
हूटिंग करके दोस्तों मेरी वाट लगा देंगे,
पल भर में मेरी कई जिंदगी बिता देंगे।
दुनिया का सबसे बड़ा रोग, हाय क्या कहेंगे लोग।2।

पानी की एक एक घूंट मुझ में जहर रहा है घोल,
तू हो गया फेल, किस्मत तेरी बेच रही है तेल। 

चल-चल ओड़ा पाव बेच ले,
रेंट के रूम में रेस्टोरेंट खोल ले।
दुनिया का सबसे बड़ा रोग,
हाय क्या कहेंगे लोग।3।

क्यों बे!अभी तेरा हीरो बनने का भूत नहीं उतरा, सुन-सुन के लगता था,
लाइफ थर्टीथ्री थाउजेण्ड वोल्ट का खतरा।
फिर भी कमबख्त दिल के किसी कोने में 

एक आशा की किरण चमकती थी, 

जो मरने से पहले जीने की आखिरी कोशिश करने को कहती थी। 

और ऐसे मुझे हो आया लोभ, 

हाय क्या कहेंगे लोग।4।

इधर मैं हो रहा था फेल,
उधर किस्मत का चल रहा था खेल।
रास्ते बनते और बिगड़ते हैं, 

किस्मत से हम दिनरात लड़ते और झगड़ते हैं।

 किस्मत की मंजिल क्या है कभी नहीं पूछते हैं, 

बस अपनी रजा थोपते रहते हैं ।
दुनिया का सबसे बड़ा रोग, हाय क्या कहेंगे लोग।5।

✏श्रीनिवास द्विवेदी।

बेपरवाह

आज देखा मैंने उससे पैदल चलते हुए,
तपती दोपहरी में आगे बढ़ते हुए।
वह मस्त थी अपने चाल में,
कोई फिक्र नहीं लोग आ जा रहे हैं टैक्सी में।

पर वह तनिक भी संकोच में नहीं,
जैसे टैक्सी में लोग मस्त सवारी का आनंद ले रहे हैं वैसे वह भी मचलते हुए सड़क का आनंद ले रही है।

न थकान है, न सिकन है।
बेपरवाह फुटपाथ पर बढ़ रही है,
लेकिन एक चीज मुझे समझ में नहीं आई।
क्यों लड़की पैदल चल रही है ?

दौड़ती-भागती ट्रैफिक में क्या उसको जरा सा भी नहीं लगा कि उसे भी सवारी करनी चाहिए, उसको भी ऑटो में बैठ कर चलना चाहिए।
✏श्रीनिवास द्विवेदी।

तशव्वुर

मेरी तशव्वुर का इम्तिहान ले रहे हो,
मेरी वफ़ा को बदनाम कर रहे हो।
यह मुझे तुम किस खता की सजा दे रहे हो,
मेरी वफ़ा को इल्जाम दे रहे हो।
मेरा हर वक्त है तुझ पर निसार,
मैंने दुआओं में मांगी है तेरे लिए खुशियां बेशुमार। हर लम्हा सजाया है देकर अपना चैनो करार,
ऐ चांद नूरानी चेहरे तुझसे मिलने को मेरी बाहे बेकरार।
अब मेरी इल्तजा पर तुम गौर करो,
मुझे यूं ना तुम बेसब्र करो।
मेरे दिल की धड़कन बढ़ा रही हो,
इस बेरुखी से हर पल मुझे तुम नए जख्म का एहसास दे रही हो।
मेरी सब्र का इम्तिहान ले रहे हो, मेरी वफ़ा को बदनाम कर रहे हो ।1।

तेरे दीदार नहीं मुझको है सपने दिखाए,
मेरे सूनी रातों में तूने ही ख्वाबों के हैं दीप जलाए। मेरे नींदों में है तूने रंग रंग के फूल खिलाए ।
उन फूलों की कसम मैं नहीं हूं बेरहम।
है शिकवा जो तुझे हवाओं ने किया,
वह मेरे मोहब्बत का ले रहे हैं इंतहा।
बेखबर तुम मुझको दे रहे हो सजा,
फिर भी मुझको पसंद है तेरी यह अदा।
मेरी वफ़ा को बदनाम कर रहे हो,
मेरी तशव्वुर का इम्तिहान ले रहे हो।2।

ऐ दिलरुबा मेरा दिल तो है तुझ पर फिदा,
तू मुझ से मरने से भी नहीं होगी जुदा।
मेरी सांसों में होगी तेरे लिए दुआ,
होठों पर तेरी रजा। तू मेरी सुबह है शाम है,
मेरी जिंदगी का महताब है तू,
मकसद है मन्नत है तू।
मेरे ख्वाबों की जन्नत है तू।
तेरे हां के खातिर सांसे भर रहा हूं,
हर पल तेरे ना की डर से घुट रहा हूं।
यह सच है कि तुम मुझसे प्यार कर रहे हो,
फिर क्यों शक कर रहे हो।
मेरी वफ़ा को बदनाम कर रहे हो,
मेरी तशव्वुर का इम्तिहान ले रहे हो।3।✏श्रीनिवास द्विवेदी।

तुम

उस से बातें कर के दिल में उत्सव सा होने लगता है, रोम रोम खिल उठता है,
जिस्म की हर गली गली में मेला सजता है। मुस्काता है कोना कोना ।
दिल की सरगम पर उसकी यादों का गाना बजने लगता है
पल पल मुस्काना, हंसना हंसाना रूठना मनाना, बस यही तो है तेरा हो जाना।
मैं ढूंढता रहता हूं तुम्हारे चमचमाते दांतों में खुशियां,
जब मुझे यह नहीं मिलते तो मैं करता हूं कुछ जोक मजाकिया।
तभी तुम बोरिंग कहकर नए की आशा बन जाती हो,
नया करने के चक्कर में तुम मेरी परिभाषा बन जाती हो।
तभी हास्य लोक का जोकॅ समंदर उमड़ता है,
जो मेरी जुबान से होकर तुम्हारे होठों पर झलकता है।
दे जाता है मुझे खुशियां।
खुशियों का बहाना, तुमसे मिलना मिलाना,
बस यही तो है तेरा हो जाना।

तू ही मेरी रफ है, तू ही मेरी फेयर।
अब बोल ना देना कहीं हाउ डेयर यू,
मैं करता हूं रेयर वाला लव यू।
मैं खुद को तुझ पर लिख भी सकता हूं,
और मिटा भी सकता हूं।
पेंसिल की तरह, रबड़ की तरह।

तुम मेरी जिंदगी की वह शेर हो ,
जिसे मैं बार-बार पढ़ता रहता हूं।
और वह कहते हैं कि यह क्या करता रहता हूं। जुबां को भाये वही स्वाद हो तुम,
दिल में जो बस जाये वही ख्वाब हो तुम।

जग रही आंखों में भी हो तुम ,
सो रही आंखों में भी हो तुम।
मेरी जिंदगी की घड़ी के हर टिक-टिक में हो तुम। हर पल हर लम्हा हर साया, में तुमको है बसाया। यही तो है तेरा हो जाना...।
✏श्रीनिवास द्विवेदी।

प्रीत की रीत

यह है दुनिया की रीत,
बंदे कोई नहीं करता तुझसे प्रीत।
सब है तेरे सुख के मीत रे बंदे,
कोई नहीं है करता तुझसे प्रीत।
तेरे सुखों के है भूखे, वह खाते हैं दाने रूखे सूखे। तेरी रसमलाई, में उनकी खुशी समाई।
तेरे भाग्य के मधुर गीत से है उनकी प्रीत।1।

तेरे कर्म प्रकाश, में छुपी है सब की जीवन आस, उजाले में जिसके देते हैं अपनी राहों को सांस। तेरी मंजिल को देख है इठलाते,
तू है मेरा अपना सगा सोच हर्षाते।
पर अग्नि परीक्षा देने से है कतराते।
तेरे हिस्से की कमाई के यह बनकर बैठे हैं खाई, अपनी बारी आएगी तो नजर ना आएगी परछाई। रे बंदे यह बेपेंदी के लोटे,
जहां देखा बिस्तर वही लेटे।
यह भूख की रीत है कोई नहीं करता तुझसे प्रीत,
यह दुनिया की रीत सब है तेरे सुखों के मीत।2।
✏श्रीनिवास द्विवेदी।

मोड़

जिंदगी के हर मोड़ पर तू खुद को खड़ा करके देख ले,
ऐ हठी मानव तू हट के साए से परे देख ले।
चल कर भी नहीं मंजिल मिलती,
हौसलों को दिलों में है सजाते फिर से चलने के लिए अपने पंखों में ऊर्जा भरे हुए।
है जब वह चलकर गिरते,
फिर उठने की दिन रात है गिनते।
पल-पल की कठिन डगर में,
भावना के अंतर्मन में।
उठती है ज्वर विपुल आकांक्षी यह में।,
हवाएं तरंग संचार में हैं स्वर मिलाएं,
भावनाओं को दे रही हैं उज्जवल आशाएं।
यह नभ कह रहा है पुकार पुकार,
उठ मानव! मन मंदिर कर ले साकार।
तेरा है धरती का गोद सुनहरा,
वस तू पहन ले धरती लाल का सेहरा।
सूरज की अल्हड रोशनी तेरे रोम रोम में है भिनी। लेकर स्वर्ण शक्ति ध्वज फहरा दे जगह आंगन में, तो समझो मानव 'हठ' है सफलता तन में।
सुबह हो शाम हो दोपहर हो रात हो,
जय हो जय हो जय हो जय हो।
मुक्त स्वर में राग मालाएं गा रही हैं दिशाएं,  नभ में नृत्य करें सुर बालाएं।
तेरे हठी नुपुर करें मधुर झंकार,
उद्यम की बगिया में मीठी मीठी फफुहार।
भर रही गड्ढों और खांई को एक समान,
उगे हैं उर्मित कुमदल पुष्प वितान,
आ जाओ भौंरो तुम कर के अस्त्र संधान।
पकी फसल का करो सम्मान,
धरा देह पर बिखरे मोती मणियों को चुनो,
सुनहरे जीवन से भंडार भरो।
चमन में नव पहर बुनो। हट मंत्र का योगी अपना हट संभाल,
लौकिक कल्याण में अर्पण कर भाल।
युग सुखों का भंडार है तुझमें,
चराचर जगत का सार है तुझमें।
लेकर स्वर्ण शक्ति ध्वज फहरा दे जगह आंगन में, तो समझो मानव हदय सफलता तन में।
मानव तू चित्रकार है धरा को भांती भांति भवन सजाता,
आलीशान अंग्रेजों के चित्रहार है तेरे स्वरूप को बताता।
✏श्रीनिवास द्विवेदी।

इतनी सी बात

बस इतनी सी बात है,
कि तू मेरे साथ है।
तो यह आसमा और यह सारा जहां मेरे साथ है। मेरे हाथों में जो तेरा हाथ है,
तो यह सारा जहां मेरे साथ है।
बस इतनी सी बात है,की तू मेरे...।1।

तेरी खुशबू है मेरी जुस्तजू,
तू ही है मेरे सुबहो-शाम की गुफ्तगू।

मेरा हर जर्रा तू है।
मेरे जिन्दगी के सारे रास्ते हर लम्हा,
पूछता है तेरा पता।
जिंदगी का हर सफर तुम पर टिकता है आकर, चलता हूं गिरता हूं फिर सम्हलता हूं बार-बार।

तुम जब जब मेरी आंखो से ओझल होती हो,
फिर से मिलने की आशा बनकर मुझमे रहती हो।

आज तकदीर का कौन सा पन्ना खुला है,
जहाँ देखता हूँ बर्बादी लिखा है।

तुम भी चले जाओगे, हम भी चले जायेंगें।
यह आशिक कँवारा ही मर जायेगा।

ऐ मेरी जिंदगी तू इस कदर मेरा इम्तहान न ले। शायद यही नियति हो मेरी।

मेरी कुछ भी नहीं हो तुम,
फिर भी बहुत कुछ हो तुम।
मेरे जिन्दगी की झूठ सच हो तुम,
अब मत पूछना की क्या हो तुम।

मैं खरीदूं वो साड़ी हो तुम,
औ मैं चलाऊं वो गाड़ी हो तुम।
✏श्रीनिवास द्विवेदी।

महँगाई

महंगाई से हुआ बुरा हाल,
जीव जंतु सब है बेहाल।
शर्म-सरि सूखी, मर्यादा सोती है भूखी।
कठिन परिश्रम कर मिलती है सूखी रोटी,
गर घर में है 'बेटी'।
नहीं दिखते हैं अब वह आजानु बाहु हष्टपुष्ट, क्योंकि जननी के जन्म अधिकार छीन रहे हैं दुष्ट।
मर्यादा-सरि-सुता को निसंकोच रहे हैं मिटा,
जैसे आलू टिंडा प्याज टमाटर के मूल्य रहे हैं भूख मिटा।
देखो कैसे घूम रहा है चक्र काल,
महंगाई से हुआ बुरा हाल।1।

आभूषणों की पड़े हैं लाले,
चारित्रिक हो या सोने वाले,
महंगाई के आगोश में है यह रहने वाले।
क्या क्या हाल बताओ भैया,
क्या एक-एक बाल गिनाऊं भैया,
इशारों में समझो छाया निपट जाल भैया।
धरती पर अब नहीं दिखते जीवन वर पौधे,
ना जाने किस-किस भांति गए हैं रौंदे।
आज वंश है उनका काल मुख में,
लेकिन होगा हर्ष उनको कि मनुष्य आज है बाहर जर के मुख से।
कुछ जीव जंतु तो भूल गए कैसी है धरती,
शेष है जो महंगाई उनके इर्द-गिर्द है फिरती।
ऐसे फैला है विषाक्त जाल,
महंगाई से हुआ बुरा हाल।2।

महंगाई डायन बन कर बैठी,
मर्यादा को बतला रही है झूठी।
अपने उदर के तप्त ज्वाला में भर लेना चाहती है धरती,
प्राकृतिक उपहार जल को भी आगोश में है ले रही,
प्राण वायु पर भी अपना अधिकार जता रही है।
ईमान को ले डूबी है, और बच्ची ही क्या खूबी है, गर है बची तो रहने दो डायन ने सुन लिया तो गजब हो जाएगी,
और उसके संग मानव की भी सामत आएगी।
अब होगा उगाना महंगाई का काल,
महंगाई से हुआ बुरा हाल,
जीव जंतु सब है बेहाल।3।

अब क्या बताऊं मैं महंगाई का दंश झेल रहा हूं, जीवन संग्राम में बाजी खेल रहा हूं। रुपए की महंगाई आई है, डालर संग घूमने वह आई है।
✏श्रीनिवास द्विवेदी।

बादल-सूरज

यह क्या बादलों ने अपनी गठरी ढीली कर दी,
जो धरती ने अपनी तिजोरी भर ली,
जीवन रत्न जल में क्या खिले कमल,
जो जीवन संगीत गाने लगे भंवरों के दल।
बादल के वरद-स्नेह है जल कण,
प्रिय अमृत को लालायित हैं रज कण,
वर्षा जल का रसास्वादन कर आई हरियाली,
हुआ लुप्त सफेदी जर। मुग्ध मेघ मधुर मल्हार, दिशा समेटे स्वर निनाद, धरा हरियाली वधू तैयार, गाए तीक्ष्ण विषाद।
उष्णता का दमन कर बादल हरियाली लाया,
सूर्य के तप्त नेत्र का भजन बन प्रिया को मुस्काया।
किंतु अधिक देर तक बात छुपी रही ना धरती से, बर्बरता से झांक रहा सूर्य अवसर के दरवाजे में। अपनी गठरी खाली देख बादल को जाना पड़ा भरने, अवसर का दरवाजा देख खुला सूर्य ने पैर पसारे।
वहीं खड़े वायु को बर्बर होने का मिला सहारा। धारा को वह स्पर्श करें इतने में आया बादल, किया जलास्त्र का संधान ठहर सका ना वह एक पल।
और सूर्य से बोला "मेरी नसों में पानी है बहता, सुन ले तू कोई और नहीं बादल है कहता, एक बार अगर मैं तुझ पर टूटा, फिर तो तेरा गर्वपिण्ड फूटा।
मेरा पराक्रम तूने देखा नहीं क्या,
जो अपनी मौत को बुला रहा।" गौर से सुनता मुस्कुराकर सूरज बोला "तू मुझ तक पहुंच नहीं सकता, मुझ पर टूटेगा कैसे, पराक्रम तेरा मुझे डिगा नहीं सकता, फिर मौत बनेगा तू कैसे।
गर तेरी नसों में जल, है तो मुझमें भी है अनल, पल भर में अस्तित्व सुनने कर सकता हूं,
तुझ में है क्या जो मैं झिझकता हूं,
कि तू मेरी ज्वाला से तप्त धरा को स्नेह देता है, जो मुझसे चाहकर भी नहीं होता है।
इसीलिए पुत्र तू पैदा होता है,
और अकड़ के आते ही मिट जाता है,
तेरा संसार मुझे बनाना आता है,
तभी तो धरती की स्निग्धता वश तुम्हे बनाता हूँ।" लेकिन गर्म किसको नहीं हुआ है,
मद में चूर बुद्धि से काम लेने वाला नहीं हुआ है। यह तो तेरी भूल है कि मुझसे टकरा कर विजई होगा,
मुझ तक आने से पहले ही धराशाही होगा।
मेरे ज्वलंत भृकुटी का भान नहीं तुम्हें,
मुझे असर नहीं कर पाते लम्हे,।
तू तो सठिया गया है, आग से खेलने चला है।
तुझ में बिखरे जल-जाल का हूं मैं काल,
जा हवाओं संग मिल विनोद कर लाल
✏श्रीनिवास द्विवेदी।