महँगाई

महंगाई से हुआ बुरा हाल,
जीव जंतु सब है बेहाल।
शर्म-सरि सूखी, मर्यादा सोती है भूखी।
कठिन परिश्रम कर मिलती है सूखी रोटी,
गर घर में है 'बेटी'।
नहीं दिखते हैं अब वह आजानु बाहु हष्टपुष्ट, क्योंकि जननी के जन्म अधिकार छीन रहे हैं दुष्ट।
मर्यादा-सरि-सुता को निसंकोच रहे हैं मिटा,
जैसे आलू टिंडा प्याज टमाटर के मूल्य रहे हैं भूख मिटा।
देखो कैसे घूम रहा है चक्र काल,
महंगाई से हुआ बुरा हाल।1।

आभूषणों की पड़े हैं लाले,
चारित्रिक हो या सोने वाले,
महंगाई के आगोश में है यह रहने वाले।
क्या क्या हाल बताओ भैया,
क्या एक-एक बाल गिनाऊं भैया,
इशारों में समझो छाया निपट जाल भैया।
धरती पर अब नहीं दिखते जीवन वर पौधे,
ना जाने किस-किस भांति गए हैं रौंदे।
आज वंश है उनका काल मुख में,
लेकिन होगा हर्ष उनको कि मनुष्य आज है बाहर जर के मुख से।
कुछ जीव जंतु तो भूल गए कैसी है धरती,
शेष है जो महंगाई उनके इर्द-गिर्द है फिरती।
ऐसे फैला है विषाक्त जाल,
महंगाई से हुआ बुरा हाल।2।

महंगाई डायन बन कर बैठी,
मर्यादा को बतला रही है झूठी।
अपने उदर के तप्त ज्वाला में भर लेना चाहती है धरती,
प्राकृतिक उपहार जल को भी आगोश में है ले रही,
प्राण वायु पर भी अपना अधिकार जता रही है।
ईमान को ले डूबी है, और बच्ची ही क्या खूबी है, गर है बची तो रहने दो डायन ने सुन लिया तो गजब हो जाएगी,
और उसके संग मानव की भी सामत आएगी।
अब होगा उगाना महंगाई का काल,
महंगाई से हुआ बुरा हाल,
जीव जंतु सब है बेहाल।3।

अब क्या बताऊं मैं महंगाई का दंश झेल रहा हूं, जीवन संग्राम में बाजी खेल रहा हूं। रुपए की महंगाई आई है, डालर संग घूमने वह आई है।
✏श्रीनिवास द्विवेदी।

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