यह क्या बादलों ने अपनी गठरी ढीली कर दी,
जो धरती ने अपनी तिजोरी भर ली,
जीवन रत्न जल में क्या खिले कमल,
जो जीवन संगीत गाने लगे भंवरों के दल।
बादल के वरद-स्नेह है जल कण,
प्रिय अमृत को लालायित हैं रज कण,
वर्षा जल का रसास्वादन कर आई हरियाली,
हुआ लुप्त सफेदी जर। मुग्ध मेघ मधुर मल्हार, दिशा समेटे स्वर निनाद, धरा हरियाली वधू तैयार, गाए तीक्ष्ण विषाद।
उष्णता का दमन कर बादल हरियाली लाया,
सूर्य के तप्त नेत्र का भजन बन प्रिया को मुस्काया।
किंतु अधिक देर तक बात छुपी रही ना धरती से, बर्बरता से झांक रहा सूर्य अवसर के दरवाजे में। अपनी गठरी खाली देख बादल को जाना पड़ा भरने, अवसर का दरवाजा देख खुला सूर्य ने पैर पसारे।
वहीं खड़े वायु को बर्बर होने का मिला सहारा। धारा को वह स्पर्श करें इतने में आया बादल, किया जलास्त्र का संधान ठहर सका ना वह एक पल।
और सूर्य से बोला "मेरी नसों में पानी है बहता, सुन ले तू कोई और नहीं बादल है कहता, एक बार अगर मैं तुझ पर टूटा, फिर तो तेरा गर्वपिण्ड फूटा।
मेरा पराक्रम तूने देखा नहीं क्या,
जो अपनी मौत को बुला रहा।" गौर से सुनता मुस्कुराकर सूरज बोला "तू मुझ तक पहुंच नहीं सकता, मुझ पर टूटेगा कैसे, पराक्रम तेरा मुझे डिगा नहीं सकता, फिर मौत बनेगा तू कैसे।
गर तेरी नसों में जल, है तो मुझमें भी है अनल, पल भर में अस्तित्व सुनने कर सकता हूं,
तुझ में है क्या जो मैं झिझकता हूं,
कि तू मेरी ज्वाला से तप्त धरा को स्नेह देता है, जो मुझसे चाहकर भी नहीं होता है।
इसीलिए पुत्र तू पैदा होता है,
और अकड़ के आते ही मिट जाता है,
तेरा संसार मुझे बनाना आता है,
तभी तो धरती की स्निग्धता वश तुम्हे बनाता हूँ।" लेकिन गर्म किसको नहीं हुआ है,
मद में चूर बुद्धि से काम लेने वाला नहीं हुआ है। यह तो तेरी भूल है कि मुझसे टकरा कर विजई होगा,
मुझ तक आने से पहले ही धराशाही होगा।
मेरे ज्वलंत भृकुटी का भान नहीं तुम्हें,
मुझे असर नहीं कर पाते लम्हे,।
तू तो सठिया गया है, आग से खेलने चला है।
तुझ में बिखरे जल-जाल का हूं मैं काल,
जा हवाओं संग मिल विनोद कर लाल
✏श्रीनिवास द्विवेदी।
बादल-सूरज
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