मोड़

जिंदगी के हर मोड़ पर तू खुद को खड़ा करके देख ले,
ऐ हठी मानव तू हट के साए से परे देख ले।
चल कर भी नहीं मंजिल मिलती,
हौसलों को दिलों में है सजाते फिर से चलने के लिए अपने पंखों में ऊर्जा भरे हुए।
है जब वह चलकर गिरते,
फिर उठने की दिन रात है गिनते।
पल-पल की कठिन डगर में,
भावना के अंतर्मन में।
उठती है ज्वर विपुल आकांक्षी यह में।,
हवाएं तरंग संचार में हैं स्वर मिलाएं,
भावनाओं को दे रही हैं उज्जवल आशाएं।
यह नभ कह रहा है पुकार पुकार,
उठ मानव! मन मंदिर कर ले साकार।
तेरा है धरती का गोद सुनहरा,
वस तू पहन ले धरती लाल का सेहरा।
सूरज की अल्हड रोशनी तेरे रोम रोम में है भिनी। लेकर स्वर्ण शक्ति ध्वज फहरा दे जगह आंगन में, तो समझो मानव 'हठ' है सफलता तन में।
सुबह हो शाम हो दोपहर हो रात हो,
जय हो जय हो जय हो जय हो।
मुक्त स्वर में राग मालाएं गा रही हैं दिशाएं,  नभ में नृत्य करें सुर बालाएं।
तेरे हठी नुपुर करें मधुर झंकार,
उद्यम की बगिया में मीठी मीठी फफुहार।
भर रही गड्ढों और खांई को एक समान,
उगे हैं उर्मित कुमदल पुष्प वितान,
आ जाओ भौंरो तुम कर के अस्त्र संधान।
पकी फसल का करो सम्मान,
धरा देह पर बिखरे मोती मणियों को चुनो,
सुनहरे जीवन से भंडार भरो।
चमन में नव पहर बुनो। हट मंत्र का योगी अपना हट संभाल,
लौकिक कल्याण में अर्पण कर भाल।
युग सुखों का भंडार है तुझमें,
चराचर जगत का सार है तुझमें।
लेकर स्वर्ण शक्ति ध्वज फहरा दे जगह आंगन में, तो समझो मानव हदय सफलता तन में।
मानव तू चित्रकार है धरा को भांती भांति भवन सजाता,
आलीशान अंग्रेजों के चित्रहार है तेरे स्वरूप को बताता।
✏श्रीनिवास द्विवेदी।

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