फिर कलंकित ना हो कोई बांसुरी वासना से,
राग न टूटे कोई फिर कामना से।
आहत हुए हैं सब भावना से,
निस्तब्ध सदाचार खड़ा है वेदना से।
क्या क्षीर में मिल गया जहर,
या कोख से पशु बनकर आया कहर।
प्रशंस माटी का बना नृशंस,
सूत समेत खेलेगा इसका दंश।
सोच क्या अस्तित्व है तेरा,
अगर जीवित सतीत्व नहीं रहा मेरा।
तू भक्षक बने मेरा, तो भला मैं रक्षक कैसे बनूं तेरा कुछ और नहीं बख्श दे अस्मत, कोख रहे सलामत सोच ना आने दे करामत।
✏श्रीनिवास द्विवेदी।
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