अजान बाहु उठा कर गरजो

अजान बाहु उठा कर गरजो,
अब ना किसी को  बरजो।
रियायत कैसा शूलों से, किफायत करो तो फूलों से जब तोड़ो फूल चुभते हैं,
कलमुहे फूलों के पास उगते हैं।
भयानक सूरत से तंग कर,
चलाने नहीं देते भंवरों को पर।
अजान बाहु उठा कर गरजो अबना किसी..।1।
 
कोई भी पैगाम भेजूं तो कैसे,
कोई भी सलाम आए तो कैसे।
गर फूलों से दोस्ती करो तो कैसे, भला कैसे ?
 निगोड़े को कुछ काम तो है नहीं,
आंखों की बर्छी लिए बैठा नहीं जाता कहीं।
सांस चले तो कैसे बगैर कुसमो के,
सांसों की डोर बंधी है इनसे।
अब ना किसी को बरजो..।2।
 
बहुत हुआ रोना बातों का बहाना,
शस्त्रों से शूलों का गला काट बहाना।
जीवन का जंग जीतने का उमंग,
जीवन समर्पण ही है भंग।
 पीछे नाम मुड़ो बढ़कर लड़ो,
 वक्त की आवाज को तुम शांति से नवाज दो। मनचली सफलता खुद दौड़ती चली बाहों में, लिपटी जैसे लताओं से कली।
आजान बाहु...।3।
 
शूल हो या चट्टान आने ना देना थकान,
तुम वीर पुरुष हो नहीं दुधमुंहा नादान।
टूट कर यह बिखर जाएंगे हार कर,
सिर्फ तू समर्पण को अपने प्यार कर।
खुली आंखों में दिखे जब निशाना,
खुली किस्मत तब समझना।
उसके आगोश में ना जा,
उसे अपने आगोश में आने देना।
अजान बाहु उठा कर गरजो, अबना किसी को बरजो।
✏श्रीनिवास द्विवेदी ।

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